Breaking

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

विचार प्रवाह / उत्तम चरित्र का शिक्षक ही राष्ट्र को उत्तम नागरिक दे सकता है : धर्मवीर गुप्ता

                                                         धर्मवीर गुप्ता फाइल चित्र
 नर्सरी कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा छात्रा हाथ में छड़ी लिए हुए अपने बड़े भाई बहनों को पढ़ाने का अभिनय कर रही थी थी। वह कभी कुर्सी पर बैठती कभी जमीन पर बैठे भाई बहनों के चारों ओर चक्कर लगाते हुए कह रही थी ,"पढ़ो ,अच्छे से पढ़ो ।" उसका यह अभिनय वैसे तो एक बाल लीला का ही रूप रूप है, उसके खेलने का तरीका है किंतु उसके खेल से यह बात प्रमाणित हो रही थी कि उस पर पर अपनी अध्यापिका का प्रभाव है, उसने जिस तरह अपनी अध्यापिका को कक्षा में छात्रों को पढ़ाते हुए देखा ठीक उसी तरह का व्यवहार वह अपने घर पर आकर कर रही थी, उसके इस व्यवहार से इस बात की भी स्पष्ट झलक मिल रही थी कि अध्यापिका का व्यवहार कक्षा में अपने छात्रों के साथ कैसा रहता होगा।
                    उसके इस खेल को देखकर मैं काफी देर तक सोचता रहा की यदि उस नन्हीं सी बालिका पर अध्यापक का इतना अधिक प्रभाव है तो क्या अन्य बालकों पर अध्यापक का प्रभाव नहीं पड़ता होगा? और यदि अध्यापक पर उन बालकों पर प्रभाव पड़ता है तो फिर बालकों में मानवीय मूल्यों का ह्रास क्यों हो रहा है? उनकी बातचीत करने की शैली क्यों नहीं प्रभावशाली है? उनमें उद्दंडता का भाव कैसे है? वे राष्ट्र हित के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं? क्या इसका सीधा संबंध अध्यापकों के चरित्र से है? इन बातों पर विचार कर ही रहा था कि सहसा मुझे पुस्तक में गाँधी जी के सम्बंध में एक घटना ध्यान आयी। एक महिला गांधीजी के पास अपने बालक को लेकर मीठा छुड़वाने के लिए गई तो गांधी जी ने उस महिला से कहा कि अगले सप्ताह आओ, तब मैं बालक को समझाऊँगा और जब महिला पुनः अगले सप्ताह अपने बालक को लेकर गांधी जी के पास आयी। उन्होंने उस बालक से कहा की गुड़ खाना अच्छी बात नहीं वह छोड़ दो। बालक ने भी उनकी बात मान ली। महिला ने गांधी जी से कहा कि जब इतनी ही बात कहनी थी तो यह बात आप जब मैं पहले आई थी तब भी कह सकते थे। गांधी जी ने ने जवाब दिया कि पहले मैं गुड़ स्वयं खाया खाया करता था तब मेरी बात का प्रभाव बालक पर नहीं पड़ता। इस एक सप्ताह में मैंने स्वयं गुड़ खाना छोड़ दिया है। तब जाकर मैंने बालक से गुड़ छोड़ने के लिए कहा है छोड़ने के लिए कहा है महिला संतुष्ट होकर चली गई और बालक ने भी गुड़ खाना छोड़ दिया छोड़ दिया।
                  मैं राजकीय, वित्तविहीन विद्यालयों के कई अध्यापकों को शराब के नशे में डूबते हुए देखता हूँ। कई अध्यापकों को पुड़िया पान तंबाकू खाते हुए देखता हूँ। यह भी देखता हूँ कि दूर खड़ा बालक अपने अध्यापक को दुकानों से पुड़िया पान खरीदते हुए फाड़कर खाते हुए देखता है फिर वह अध्यापक का अनुसरण करते हुए स्वयं चंचल जैसी सुपारी की पुड़िया लेकर खाता है।
               उसके बाद जब भी मैं किसी अध्यापक को पुड़िया, पान और तंबाकू खाते हुए देखता हूँ अथवा सुरापान किए हुए हुए देखता हूँ। मेरे मन में यह बार-बार प्रश्न उठता है कि क्या ये अध्यापक भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने में अपना योगदान दे सकेंगे? क्या ये अध्यापक राष्ट्र को श्रेष्ठ नागरिक दे सकेंगे? श्रेष्ठ नागरिक भी वही अध्यापक या शिक्षक दे सकता है जो स्वयं चरित्रवान हो मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत हो क्योंकि जब नन्हीं बालिका अपनी अध्यापिका के प्रभाव से उस जैसा बनने का अभिनय कर सकती है तो क्या अन्य बालक अपने अध्यापकों जैसा बनने का प्रयत्न नहीं करेंगे ? जब बालक अपने अध्यापक को पुड़िया ,पान तंबाकू खाते हुए देखेंगे वे कभी भी इन नशों से दूर रह पाएंगे या वे अपने अध्यापक को शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए देखेंगे वे उन जैसा अभिनय करने का प्रयत्न नहीं करेंगे। शिक्षण संस्थाओं से भी यह निवेदन करता हूँ कि वह अपने शिक्षण संस्थाओं को ऐसे अध्यापकों, शिक्षकों से दूर रखें जो इस प्रकार के नशों में डूबे रहने के आदी हो। शिक्षण संस्थाओं का दायित्व मात्र धन उपार्जन करना ही नहीं होता है बल्कि उनका दायित्व राष्ट्र को श्रेष्ठ नागरिक देना भी होता है और राष्ट्र की उन्नति के मार्ग में सहायता प्रदान करने वाले युवाओं को तैयार करना भी होता है।
                 एक व्यक्ति जब शिक्षक बनकर अध्यापन का दायित्व ग्रहण करता है तो उसका जीवन स्वयं का न होकर समाज का हो जाता है। उसका प्रत्येक कृत्य, उसकी प्रत्येक शैली जैसे बातचीत की शैली, उसका दूसरों के साथ किया जाने वाला वाला वाला व्यवहार ,उसका दूसरों के मदद करने का तरीका, यह सब बालक बालिकाओं के लिए अनुकरणीय हो जाता है तथा बालक बालिकाएं भी उन जैसा बनने का ही प्रयत्न करते हैं  यदि बालक को एक चरित्रवान शिक्षक मिल जाता है तो वे भी चरित्रवान बनते हैं। शिवा जी ,चंद्रगुप्त मौर्य श्रेष्ठ शिक्षक के श्रेष्ठ छात्र  हुए हैं।
लेखक : धर्मवीर गुप्ता   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Comments