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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

अमर सुकवि भोलानाथ शेखर : जन्म और निर्वाण की एक तिथि, साहित्य और राष्ट्रभक्ति का अमर इतिहास

🔘 जन्म और निर्वाण की एक तिथि, साहित्य और राष्ट्रभक्ति का अमर इतिहास

🔘 अमर शहीद सुकवि भोलानाथ शेखर : जिनकी अंतिम सांसों में भी गूंजा था साहित्य, जिनकी स्मृतियों में आज भी जीवित है राष्ट्रप्रेम

लखीमपुर-खीरी। कुछ व्यक्तित्व समय की सीमाओं में नहीं बंधते। उनका जीवन भले ही अल्पकालिक हो, लेकिन उनके विचार, उनकी रचनाएं और उनके आदर्श युगों तक समाज को प्रेरित करते रहते हैं। साहित्य की ऐसी ही तेजस्वी विभूति थे अमर शहीद सुकवि, कविवर भोलानाथ शेखर, जिनका जन्म 13 अक्टूबर 1912 को हुआ और इसी तिथि को 13 अक्टूबर 1965 को उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा ली। जन्म और निर्वाण की एक ही तिथि का यह दुर्लभ संयोग उनके जीवन को एक विशेष ऐतिहासिक और भावनात्मक पहचान प्रदान करता है।

13 अक्टूबर केवल एक तारीख नहीं, बल्कि लखीमपुर-खीरी की साहित्यिक चेतना, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव का स्मृति-पर्व है। यह वह दिन है, जब हिंदी साहित्य के एक ओजस्वी हस्ताक्षर ने अपनी लेखनी, अपने विचारों और अपने व्यक्तित्व से जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी। उनकी स्मृतियां आज भी साहित्यप्रेमियों के हृदय में श्रद्धा के दीप प्रज्वलित करती हैं। मां शारदे के इस वरद पुत्र का जन्म 13 अक्टूबर 1912 को खीरी टाउन के खत्री टोला मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता कालीचरन शेखर परम धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनका परिवार समाज में 'बनियान वाले शेखर जी' के नाम से विख्यात था। कविता लेखन और अभिनय के प्रति भोलानाथ शेखर का अनुराग बचपन से ही दिखाई देने लगा था। शब्दों के प्रति संवेदनशीलता, छंदों पर अधिकार और अभिव्यक्ति में ओज उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान बन गए। वह केवल कविता लिखने वाले रचनाकार नहीं थे, बल्कि साहित्य को जीवन की अनुभूतियों, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ने वाले कवि थे। उनकी गणना सनेही मंडल के प्रमुख कवियों में की जाती है। उस दौर में साहित्यिक गोष्ठियों और समस्यापूर्ति की परंपरा का विशेष महत्व था। कवियों की प्रतिभा का आकलन उनकी छंद-साधना, शब्द-चयन और काव्य-कौशल से किया जाता था।

 सुप्रसिद्ध कवि गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' की पत्रिका 'सुकवि' में रचनाओं का प्रकाशित होना साहित्यिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। भोलानाथ शेखर की अनेक समस्यापूर्तियां भी इस पत्रिका में प्रकाशित हुईं। उनकी युवा कवि मंडली में रामप्रसाद सर्राफ, 'हरहर महादेव' महाकाव्य के रचयिता; स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं 'बचालो देश' के रचनाकार ब्रज बिहारी लाल सहगल; पंडित यमुनादीन मिश्र 'यमुनेन्द्र' और सीताराम 'भुर्जेश' जैसे साहित्यप्रेमी शामिल थे। इन साहित्यकारों के बीच चलने वाली काव्य-चर्चाओं ने उस समय के साहित्यिक वातावरण को समृद्ध किया। नाम के अनुरूप सरल, सहज और निष्कपट स्वभाव वाले भोलानाथ शेखर भावुक हृदय के धनी थे। नारी के प्रति सम्मान, राष्ट्र के प्रति समर्पण और समाज के प्रति संवेदनशीलता उनकी रचनाओं में सहज रूप से अभिव्यक्त होती थी। भोलानाथ शेखर की कविता में केवल शब्दों की सजावट नहीं, बल्कि जीवन के आदर्शों की सजीव अभिव्यक्ति थी। वह नारी की गरिमा, त्याग और अदम्य साहस के प्रशंसक थे। रानी पद्मिनी के बलिदान और नारी शक्ति का चित्रण करते हुए उनकी ओजस्वी लेखनी कह उठती थी “तुमने सदैव चलना सीखा खांड़ों पर और दुधारों पर। तुम वीर पदमिनी रानी हो जो कूदी थी अंगारों पर।” इन पंक्तियों में नारी के साहस, स्वाभिमान और आत्मबल के प्रति कवि की गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।

 उनकी दृष्टि में नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि इतिहास रचने वाली शक्ति भी थी। स्वाधीनता आंदोलन के संघर्षों ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। अंग्रेजी शासन के अत्याचार, सत्याग्रहियों की यातनाएं और स्वतंत्रता सेनानियों का अदम्य साहस उनकी कविता में साकार हो उठता था। जेलों की यातनाओं और क्रांतिकारियों की पीड़ा का चित्रण करते हुए वह लिखते थे “जब अंग्रेजों की पुलिस पकड़ सत्याग्रहियों को लेती थी, हथकड़ी हाथ में तथा पैर में बेड़ी डलवा देती थी। मारते-मारते जब उनकी चमड़ी उधेड़ दी जाती थी, तब कारागृह ले जा उनको तन्हाई दे दी जाती थी।” इन पंक्तियों में स्वतंत्रता संग्राम की वेदना और स्वाधीनता के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले सेनानियों के प्रति श्रद्धा का स्वर सुनाई देता है। उनकी राष्ट्रभक्ति किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं थी। वह स्वतंत्र भारत को अखंड, समृद्ध और सुखी देखना चाहते थे। उनकी कविता 'कामना' में व्यक्त राष्ट्रीय स्वप्न आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है “चाहता हूं देश की स्वतंत्रता बनी रहे,
चाहता हूं देश की अखंडता बनी रहे।
चाहता हूं देश में सर्वत्र रामराज हो,
चाहता हूं देश का सुखी-सुखी समाज हो।” इन पंक्तियों में स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, सुशासन और सामाजिक सुख-समृद्धि का ऐसा संदेश समाहित है, जो हर पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है। वर्ष 1962 में चीन के आक्रमण ने देशवासियों की तरह कविवर भोलानाथ शेखर के मन को भी व्यथित कर दिया था। उनकी संवेदनशील आत्मा में राष्ट्र की सुरक्षा और स्वाभिमान के प्रति गहरी चिंता थी। 

उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से चीन को चुनौती देते हुए भारतीय वीरता और ऐतिहासिक पराक्रम का स्मरण कराया “तूने चाऊ क्या समझा है भारत के लाल प्रवालों को। तूने चाऊ क्या समझा है काले-कराल विकरालों को।” इसके आगे वह भारतीय इतिहास के अमर बलिदानियों का स्मरण कराते हुए कहते हैं “इतिहास खोलकर देख आज उस झांसी वाली रानी का। आजाद, चन्द्रशेखर, बिस्मिल तात्या की अमर कहानी का।” यह केवल कविता नहीं थी, बल्कि भारत की अस्मिता, शौर्य और स्वाभिमान का उद्घोष था। उनकी लेखनी में शब्द तलवार बन जाते थे और कविता राष्ट्रचेतना का स्वर। होली जैसे लोकपर्वों के चित्रण में भी उनकी प्रतिभा का एक अलग रंग दिखाई देता था। रंग, गुलाल, मित्रता, उल्लास और सामाजिक जीवन की सहजता को उन्होंने अपनी कविता में जीवंत किया। इससे स्पष्ट होता है कि उनका काव्य केवल वीर रस तक सीमित नहीं था; उसमें लोकजीवन की विविध अनुभूतियों के लिए भी पर्याप्त स्थान था। 13 अक्टूबर 1965 की वह शाम लखीमपुर-खीरी के साहित्यिक इतिहास की सबसे भावुक और अविस्मरणीय घटनाओं में गिनी जाती है। दशहरा मेले के अवसर पर ऐतिहासिक राम चबूतरे पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था। मंच पर हिंदी जगत के प्रतिष्ठित कवि डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी संचालन कर रहे थे। काव्यप्रेमियों की बड़ी संख्या अपने प्रिय रचनाकारों को सुनने के लिए उपस्थित थी। उसी दिन करवा चौथ का पावन पर्व भी था। कविवर भोलानाथ शेखर को काव्यपाठ के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया। उन्होंने नारी-महिमा पर आधारित अपनी प्रसिद्ध रचना प्रस्तुत की। कविता के प्रति उनका समर्पण और मंच से उनका आत्मीय जुड़ाव उस वातावरण को भावविभोर कर रहा था। इसके बाद उन्होंने संचालक डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी से अपने पौत्र को भी मंच पर काव्यपाठ का अवसर देने का अनुरोध किया।

 बालक को मंच पर बुलाया गया। उसने अपने दादा की कविता इतनी ओजस्वी वाणी में सुनाई कि पूरा मंच प्रशंसा और वाहवाही से गूंज उठा। अपने पौत्र की प्रतिभा देखकर भोलानाथ शेखर का हृदय गर्व और प्रसन्नता से भर उठा। भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई। उनके मुख से स्नेह और गर्व से भरे अंतिम शब्द निकले “वाह बेटा!” और अगले ही क्षण वह संचालक की गोद में लुढ़क गए। कुछ समय बाद यह हृदयविदारक समाचार मिला कि कविवर भोलानाथ शेखर अब इस संसार में नहीं रहे। कवि सम्मेलन समाप्त कर दिया गया। साहित्यिक वातावरण शोक में डूब गया। जिस मंच पर कुछ क्षण पहले कविता की गूंज थी, वहां अब एक महान कवि के असमय अवसान की निस्तब्धता छा गई। करवा चौथ की उस रात जब आकाश में सुहागिनों के चंद्रमा का उदय हो रहा था, डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी के शब्दों में, इस परिवार के भाग्याकाश का चंद्रमा अचानक अस्त हो गया था। यह संयोग कितना मार्मिक था कि 13 अक्टूबर 1912 को जन्म लेने वाले इस कवि की जीवन-यात्रा भी 13 अक्टूबर 1965 को उसी साहित्यिक अनुराग के बीच समाप्त हुई, जिसे उन्होंने जीवन भर अपनी साधना बनाया था। उनकी विदाई ने केवल एक परिवार को शोकाकुल नहीं किया, बल्कि लखीमपुर-खीरी की साहित्यिक दुनिया को भी एक ऐसी क्षति पहुंचाई, जिसकी स्मृति आज तक जीवित है। भोलानाथ शेखर की साहित्यिक विरासत उनके परिवार की स्मृतियों और उनकी प्रकाशित रचनाओं में सुरक्षित है। उनके पौत्र एडवोकेट रजत शेखर के अनुसार, वर्ष 2000 में उनकी पुस्तक 'तलवार चली' का लोकार्पण हिंदी जगत के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं कवि डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी के करकमलों से हुआ था। इस अवसर पर साहित्य जगत की अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

 इनमें डॉ. विद्यानिवास मिश्र, डॉ. राज बहादुर द्विवेदी, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत, डॉ. श्याम सुंदर मिश्र 'मधुष' तथा तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक डॉ. एस.के. सिंह प्रमुख थे। कार्यक्रम में पंडित यमुना दिन मिश्र 'यमुनेन्द्र', आचार्य बाबूराम अवस्थी, रघुनंदन प्रसाद 'इंद्र', ओम प्रकाश सर्राफ सहित अनेक साहित्यप्रेमियों और विद्वानों की सहभागिता रही। वर्ष 1965 में तत्कालीन सदर विधायक कमल अहमद रिजवी की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित साहित्यिक गतिविधियों और डॉ. कामिनी महेंद्र के मार्गदर्शन में सुश्री क्षमा टंडन, राजेंद्र प्रसाद तिवारी 'कंटक' तथा सत्यधर शुक्ला के सहयोग से संपन्न कार्यक्रमों की स्मृतियां भी उनकी साहित्यिक यात्रा से जुड़ी हुई हैं। इन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि भोलानाथ शेखर की साहित्यिक पहचान केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रही। उनके काव्य और व्यक्तित्व को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास उनके परिवार तथा साहित्यिक समाज ने निरंतर किया। भोलानाथ शेखर की स्मृतियों से जुड़ा एक और अत्यंत दुर्लभ संयोग 13 अक्टूबर 2007 को सामने आया। इसी दिन उनके पौत्र चिरंजीवी रतन शेखर और श्रीमती रचना शेखर के पुत्र एकलव्य शेखर का जन्म हुआ। जिस तारीख को 1965 में कविवर भोलानाथ शेखर ने अंतिम सांस ली थी, उसी तारीख को 2007 में परिवार में एक नई पीढ़ी का आगमन हुआ। परिवार के लिए यह संयोग भावनाओं, स्मृतियों और साहित्य के प्रति अटूट विश्वास से जुड़ा एक विशेष अवसर बन गया। इस घटना को परिवार ने अपने पूर्वज की स्मृतियों से जुड़ी एक आत्मीय अनुभूति के रूप में देखा। पीढ़ियों के बीच साहित्यिक संस्कारों की यह निरंतरता अपने आप में महत्वपूर्ण है। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि महान व्यक्तित्वों की विरासत केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि परिवार के संस्कारों, विचारों और नई पीढ़ी को दिए जाने वाले मूल्यों में भी जीवित रहती है। कविवर भोलानाथ शेखर की स्मृतियां लखीमपुर-खीरी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दशहरा मेले के ऐतिहासिक राम चबूतरे पर आयोजित वह अखिल भारतीय कवि सम्मेलन उनके जीवन की अंतिम साहित्यिक स्मृति बन गया। यह मंच केवल एक आयोजन स्थल नहीं था, बल्कि साहित्य, संस्कृति और जनमानस के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक भी था। ऐसे में नगर पालिका परिषद लखीमपुर-खीरी और स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं के सामने एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दायित्व है कि कविवर भोलानाथ शेखर की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए सार्थक पहल की जाए। उनकी स्मृति में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन को नियमित और निरंतर आयोजित करने की परंपरा विकसित की जानी चाहिए। इस आयोजन में देशभर के कवियों को आमंत्रित किया जाए, स्थानीय रचनाकारों को मंच मिले और नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य, राष्ट्रभक्ति तथा सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के अवसर प्रदान किए जाएं। उनके जीवन और साहित्य पर व्याख्यान, काव्यपाठ, साहित्यिक प्रतियोगिताएं तथा उनकी रचनाओं के पुनर्प्रकाशन जैसे प्रयास भी उनकी विरासत को व्यापक पहचान दे सकते हैं। किसी कवि को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उसकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित करना नहीं है; उसकी रचनाओं को जीवित रखना, उसके विचारों को समाज तक पहुंचाना और उसके आदर्शों को नई पीढ़ी के जीवन का हिस्सा बनाना ही वास्तविक सम्मान है। कविवर भोलानाथ शेखर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि साहित्यकार का वास्तविक जीवन उसकी सांसों की अवधि से नहीं, बल्कि उसके विचारों की जीवंतता से मापा जाता है। उन्होंने अपनी कविता में नारी-सम्मान का स्वर बुलंद किया, स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को शब्द दिए, राष्ट्रीय अखंडता का स्वप्न देखा और चीन के आक्रमण के समय देश के स्वाभिमान को अपनी लेखनी का संबल बनाया। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि सच्चा साहित्यकार अपने समय का साक्षी भी होता है, समाज का मार्गदर्शक भी और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत भी। उनके प्रपौत्र एडवोकेट रजत शेखर द्वारा साझा की गई स्मृतियां इस विरासत को और अधिक आत्मीय बना देती हैं। इन स्मृतियों में एक कवि का जीवन, एक परिवार का गर्व, एक पौत्र के प्रति दादा का स्नेह और एक नगर की सांस्कृतिक चेतना एक साथ दिखाई देती है। भोलानाथ शेखर के जीवन का वह अंतिम दृश्य आज भी हृदय को छू जाता है मंच पर खड़ा पौत्र, कविता सुनकर प्रसन्न होता दादा, गर्व से अवरुद्ध होती वाणी और अंतिम शब्दों में झलकता स्नेह “वाह बेटा!” मानो एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को आशीर्वाद देते हुए अपनी साहित्यिक विरासत सौंप दी हो। 

आज 13 अक्टूबर को उनकी जयंती और निर्वाण तिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल अतीत को नमन करना नहीं, बल्कि वर्तमान को साहित्य के मूल्यों से जोड़ना और भविष्य के लिए सांस्कृतिक चेतना का दीप जलाना है। आइए, हम सब मिलकर इस महान कवि की स्मृतियों को जीवित रखने का संकल्प लें। उनकी रचनाएं पढ़ें, उनके आदर्शों को आत्मसात करें और लखीमपुर-खीरी की साहित्यिक परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएं। छंद-साधना से किया, कवि-कुल को सनाथ। ओजस्वी साहित्य के, अमर दीप थे शेखर भोलानाथ॥ अमर शहीद सुकवि कविवर भोलानाथ शेखर को उनकी जयंती एवं निर्वाण तिथि पर शत्-शत् नमन, विनम्र श्रद्धांजलि और कोटि-कोटि प्रणाम। उनकी लेखनी की ओजस्विता, राष्ट्रप्रेम की भावना और साहित्य-साधना की सुगंध आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहे।

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