🔘 संघर्षों की तपिश से निकली सफलता की रोशनी
जब गीता बनी जीवन की गुरु और शिक्षा बना समाज परिवर्तन का संकल्प, सुकीर्ति गुप्ता की प्रेरक कहानी
"उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता 6.5)
अर्थ : मनुष्य को स्वयं अपने प्रयासों से अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए। मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे बड़ा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है।
कुछ व्यक्तित्व मंचों की चकाचौंध से नहीं, बल्कि अपने कर्मों की उजली आभा से पहचाने जाते हैं। वे शोर नहीं मचाते, बल्कि अपने संघर्ष, सादगी, सेवा और संस्कारों से समाज में परिवर्तन की ऐसी मौन क्रांति का सूत्रपात करते हैं, जिसकी गूँज वर्षों तक सुनाई देती है। सुकीर्ति गुप्ता ऐसी ही प्रेरणादायी शिक्षिका हैं, जिनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का वृत्तांत नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अध्यात्म, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के संकल्प का जीवंत दस्तावेज़ है। आज जब शिक्षा का अर्थ अक्सर केवल डिग्रियों, अंकों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित होता जा रहा है, तब सुकीर्ति गुप्ता शिक्षा को चरित्र निर्माण, आत्मबोध और समाज निर्माण की सबसे प्रभावी शक्ति मानती हैं। उनके लिए शिक्षा केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली साधना है।
हर सफलता के पीछे एक अनकही कहानी होती है। सुकीर्ति की कहानी भी बचपन के उन अनुभवों से शुरू होती है, जहाँ उन्हें रंग-रूप और शारीरिक बनावट के कारण उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ा। मासूम मन पर लगे कटु शब्द किसी को भी तोड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने इन्हीं अनुभवों को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बना लिया। उन्होंने निश्चय किया कि दुनिया उन्हें उनके चेहरे से नहीं, बल्कि उनके चरित्र, ज्ञान और कर्म से पहचानेगी। यही संकल्प उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूँजी बन गया।
कॉलेज का समय उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा लेकर आया। सामाजिक तुलना, प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और असफलताओं ने उन्हें अवसाद के कठिन दौर तक पहुँचा दिया। वर्ष 2018 में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नई दिल्ली जाकर सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। यह यात्रा केवल एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं थी, बल्कि स्वयं को खोजने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की साधना भी थी।
इसी संघर्ष के बीच गीता का यह अमर संदेश उनके जीवन का आधार बन गया "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" (श्रीमद्भगवद्गीता 2.47) अर्थ : तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता मत करो।
उन्होंने परिणामों की चिंता छोड़कर कर्म को अपना धर्म बना लिया। यही कर्मयोग उनके जीवन का पथप्रदर्शक बन गया।
जीवन के सबसे कठिन समय में उनकी माता ने उन्हें रामचरितमानस और बाद में श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने की प्रेरणा दी। गीता के प्रत्येक श्लोक ने उनके भीतर आशा, धैर्य और आत्मबल का नया प्रकाश जगाया। उन्हें अनुभव हुआ कि जीवन की सबसे बड़ी विजय बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मन की स्थिरता और उद्देश्य की स्पष्टता में होती है। उन्हें विशेष रूप से यह श्लोक जीवन का मार्गदर्शन देता रहा "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥" (श्रीमद्भगवद्गीता 2.14)
अर्थ : सुख और दुःख, लाभ और हानि जीवन में आते-जाते रहते हैं। धैर्यपूर्वक उनका सामना करो। यही धैर्य उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। उन्होंने समझ लिया कि कठिन समय स्थायी नहीं होता, लेकिन कठिन समय में लिया गया सही निर्णय जीवन बदल देता है।
आत्मबोध के बाद उन्होंने बी.एड. किया और शिक्षक बनने का निर्णय लिया। उनके लिए यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का संकल्प था। उनका जीवन-दर्शन एक अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली सूत्र में समाहित है "आध्यात्मिक शिक्षा + भौतिक शिक्षा = संपूर्ण शिक्षा" उनका मानना है कि भौतिक शिक्षा मनुष्य को आजीविका कमाना सिखाती है, जबकि आध्यात्मिक शिक्षा उसे यह समझाती है कि जीवन क्यों और किसके लिए जिया जाए। जब दोनों का संतुलन बनता है, तभी आदर्श नागरिक और सशक्त समाज का निर्माण संभव होता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अब तक श्रीमद्भगवद्गीता की 151 प्रतियाँ वितरित की हैं। यह केवल पुस्तकों का वितरण नहीं, बल्कि विचारों, संस्कारों और सकारात्मक चेतना का प्रसार है।
उनका विश्वास है "एक अच्छी सोच एक अच्छा इंसान बनाती है, और एक अच्छा इंसान एक मजबूत संगठन तथा सशक्त समाज का निर्माण करता है।"
सुकीर्ति गुप्ता की कक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहती। वहाँ विद्यार्थियों को आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, सहानुभूति, तार्किक सोच, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी पाठ पढ़ाया जाता है। वह विद्यार्थियों से कहती हैं "परीक्षा के अंक जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। वास्तविक सफलता वह है, जहाँ ज्ञान के साथ विनम्रता और उपलब्धियों के साथ मानवीय संवेदनाएँ भी बनी रहें।"
महिलाओं के लिए आत्मविश्वास का संदेश अपने जीवन के अनुभवों से सीख लेते हुए वह महिलाओं और युवतियों को प्रेरित करती हैं कि समाज की सीमाएँ नहीं, बल्कि अपने सपनों की ऊँचाई तय करें। उनका मानना है "आत्मविश्वास से बड़ा कोई आभूषण नहीं और आत्मनिर्भरता से बड़ी कोई शक्ति नहीं।" वह महिलाओं को भय, संकोच और सामाजिक रूढ़ियों से बाहर निकलकर अपनी पहचान स्वयं बनाने के लिए प्रेरित करती हैं।
सुकीर्ति गुप्ता विद्यार्थियों को केवल श्लोक याद नहीं करातीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की प्रेरणा देती हैं।
कर्मयोग का संदेश "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" (2.47) मेहनत करो, परिणाम की चिंता मत करो। "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।" (6.5) अर्थात अपने मन को अपना मित्र बनाओ, स्वयं को कभी निराश मत होने दो।
धैर्य का संदेश "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।" (2.14) मतलब सुख-दुःख जीवन के पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं। हर परिस्थिति में संतुलित रहो। गीता का एक पंक्ति में सार "कर्म करो, मन को वश में रखो और हर परिस्थिति में शांत रहो।"
आज सुकीर्ति गुप्ता उन शिक्षकों की नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो केवल पाठ नहीं पढ़ाते, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ते हैं; जो केवल करियर नहीं बनाते, बल्कि चरित्र का निर्माण करते हैं; जो केवल सफलता का सपना नहीं दिखाते, बल्कि जीवन का उद्देश्य भी समझाते हैं। उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि संघर्ष कभी भी किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होता। यदि मन में विश्वास, कर्म में निष्ठा और आत्मा में गीता का प्रकाश हो, तो जीवन की हर कठिनाई नई संभावनाओं का द्वार बन जाती है।
शायद इसलिए सुकीर्ति गुप्ता की कहानी केवल एक शिक्षिका की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है जो कहता है "जब शिक्षा में संस्कार जुड़ते हैं, जब ज्ञान में अध्यात्म का प्रकाश मिलता है और जब शिक्षक अपने विद्यार्थियों को केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं, तभी एक सशक्त, संवेदनशील और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होता है।"
इच्छुक विद्यार्थी एवं अभिभावक सुकीर्ति गुप्ता की कक्षाओं एवं मार्गदर्शन से जुड़कर शिक्षा, व्यक्तित्व विकास, जीवन मूल्यों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रेरणादायी संदेशों पर आधारित इस सार्थक यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं।
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