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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

अपने बुजुर्गों को भविष्य की चिंता से सुरक्षित रखना युवाओं की जिम्मेदारी

                    लेखक : धर्मवीर गुप्ता

        पन्द्रह वर्ष पूर्व एक दिन मेरी माता जी जब बाहर से आयी तो उनके चेहरे पर उदासी थी। मैंने उनकी उदासी का कारण जानने के लिए उनसे पूछा कि क्या आपकी तबियत ठीक नहीं है? उन्होंने बताया कि तबियत ठीक है। मैंने उनसे कहा, फिर आप इतनी उदास क्यों हैं? इतना सुनकर उनकी आंखों में आँसू आ गये। उन्होंने सिसकते हुए कहा, जब मैं बाहर दरवाजे पर बैठी थी तो पड़ोस की एक वृद्ध महिला मिली थी। वह रो रोकर कह रही थी कि उसके बेटे उसे खाने के लिए भी नहीं पूछते हैं। यदि उसके पास धन-संपत्ति होता तो कोई भी उसके बुढ़ापे का सहारा बन जाता परंतु उसके पास तो कुछ भी नहीं है। बुढ़ापा वह किसके भरोसे काटे। मेरे पास भी कुछ नहीं है। कहीं हमारे साथ भी ऐसा न हो यही सोच कर चिंतित हूँ। सामाजिक बुराई के रूप में उभरती इस नयी समस्या को देखते हुए माता की चिंता अपनी जगह उचित थी परन्तु हमारे लिए कष्टदायक थी। जन्म देने से लेकर लालन पालन में अतुलनीय कष्ट हँसकर सहने वाली माता को इस चिन्ता ने घेरा तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ उन्होंने महसूस किया होगा। उनकी आंखों में आँसू देख मेरी आँखों में भी आँसू आ गये।
     आँसू आने का कारण माता के प्रति मेरी अगाध श्रद्धा और प्रेम था। बालपन से शायद कभी ऐसा अवसर आया हो जब मैंने शाम को उनसे यह न पूछा हो कि मम्मी आपने खाना खाया या नहीं। उनका अक्सर यही जवाब होता मैंने खाना खा लिया है। उसके बाद भी खाना खाते समय जिद करके उन्हें थोड़ा बहुत खाने को विवश कर देता। पुत्र प्रेम से वह भी कभी इनकार नही कर पाती थी। मेरे विवाह के बाद तक यही क्रम चलता रहा। उसके बावजूद उनकी यह चिन्ता मुझे विचलित कर रही थी। 
        मैंने उनके चरणों में मस्तक रख दिया और कहा कि यदि मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें। उन्होंने प्यार से सिर पर हाथ फेरा और बोली तुमसे कोई गलती नहीं हुई है। बस उस महिला की पीड़ा देखी तो आह आ गयी। मैंने माता से कहा, माँ आप स्वतंत्र हैं, जब भी कभी आपका जी चाहे किसी को भोजन कराएं या कपड़े दें। आपका कोई भी हाथ नहीं रोकेगा। मां की चिंता शायद कम हुई। इस घटना के चार वर्ष बाद वे बीमार हो गयी। राममूर्ति अस्पताल भोजीपुरा में जाँच कराने पर पता चला कि वे कुछ महीनों की मेहमान हैं। उनकी सेवा में कोई कमी न रह जाये इस बात का पूरा ध्यान हमारी जीवन संगिनी भी रखती। रिश्ते नाते से संबंधित लोग उनसे आकर पूछते चाची कोई और इच्छा हो तो बताइए। वे एक ही जवाब देती मेरी सारी इच्छा मेरे बच्चों ने पूरी कर दी है, अब किसी और चीज की इच्छा नहीं है। बिस्तर पर पड़े रहने के बाद भी वे हमारे खाने पीने का ध्यान रखती। अध्यापन कार्य के बाद जब भी घर पहुंचता वे तुरंत धर्मपत्नी का नाम लेते हुए आवाज देती देखो धर्मवीर आया है उसे खाना दे दो। कभी पानी देने के लिए कहती। 
          मैंने एक बार उनसे यहां तक कह दिया कि आप जानती हैं कि आप कुछ ही दिनों की मेहमान है। इस मोह ममता का त्याग करके ईश्वर का ध्यान कीजिए आपकी पीड़ा भी कम होगी और मृत्यु का कष्ट भी। उनकी आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने कहा कि यह मोह ममता अब कम नहीं होगी। अब तो यह शरीर से प्राण निकलने के बाद ही कम होगी। उनकी इच्छा का ध्यान रखते हुए उनसे गोदान कराया गया। यद्यपि बीमार होने से पांचवे महीने वे इस दुनिया को अलविदा कह ईश्वर के परमधाम को चली गयी। उनके वे शब्द आज भी मुझे चिंतन करने को विवश कर देते हैं। 
       जिन माता पिता के रहते हुए बच्चे स्वयं सुरक्षित महसूस करते हैं वही माता-पिता अपने वृद्धावस्था को लेकर उन्हीं बच्चों से स्वयं को असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं? उनकी इस असुरक्षा की भावना को समाप्त करने के लिए युवा क्या कर सकता है। उसे इस पर विचार करना चाहिए। माता पिता को अपने असुरक्षित भविष्य की चिंता से मुक्त करना उनके युवा हो चुके बच्चों का दायित्व है और इस दायित्व को युवाओं के हृदय में बसाने का काम भी बाल्यावस्था से ही किया जाना चाहिए।

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