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बुधवार, 11 जनवरी 2023

विचार प्रवाह / कहीं अपनों से दूर न कर दे घायल की उपेक्षा

                     लेखक : धर्मवीर गुप्ता
   अक्सर देखा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति हादसे में घायल हो जाता है तो लोग निकलते चले जाते हैं। जो रुकते भी हैं वे भी फोटो खींचने या वीडियो बनाने में लग जाते हैं ताकि उसे वायरल कर सके। कोई मदद नहीं करता जबकि शायद हमारी थोड़ी सी सहायता उसका जीवन बचा दे। लोग बात तो करेंगे कि यदि घायल व्यक्ति अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो बच जाएगा, किंतु कोई भी उसे अस्पताल ले जाने का साहस नहीं करेगा।  किसी को जल्दी है, तो कोई पुलिस के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता, किसी के पास साहस नहीं है, किसी के पास पैसा नहीं है किंतु यदि सभी ऐसा ही सोचते रहे तो उस व्यक्ति का जीवन चला जाएगा।  हो सकता है उसका जीवन कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो। मानवता के नाते हमें सड़क पर कोई घायल व्यक्ति दिखाई दे तो हमें उसे अस्पताल अवश्य पहुंचाना चाहिए।  कई बार देखा गया है कि लोग इस दायित्व से बचने के चलते अपनों को खो चुके हैं। मैंने एक बार समाचार पत्र में ही पढ़ा था कि एक वकील साहब कचहरी जा रहे थे। रास्ते में लोगों की भीड़ लगी थी । वकील साहब ने रुककर पूछा ,"क्या हुआ है?"" एक्सीडेंट हो गया है" एक आवाज आयी। वकील साहब चले गये। उन्होंने वहां जाकर देखने की जहमत नहीं उठाई। जब कचहरी पहुंचे लोगों ने उनसे कहा कि आपके भाई का एक्सीडेंट हो गया है। वे पुनः घटनास्थल पर पहुंचे। भाई को उठाकर अस्पताल ले गए किंतु तब तक देर हो चुकी थी । काफी खून बह चुका था। अस्पताल ले जाते समय घायल व्यक्ति ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों का कहना था कि यदि थोड़े समय पहले अस्पताल लाए जाते तो शायद बच जाते । अब आप मृत्यु का कारण क्या मानेंगे? दोषी किसे मानेंगे? जो भी हो यदि इनके अंदर मानवता का भाव होता और घायलों को अस्पताल पहुंचाने का जज्बा होता तो शायद उनका भाई जीवित होता। एक अन्य मामले में गोला बांकेगंज सड़क पर एक मोटरसाइकिल सवार ने साइकिल सवार को टक्कर मार दी। दुर्घटना होने के बाद मोटरसाइकिल सवार भाग गया। साइकिल सवार को अत्यधिक चोटें आई और उसका काफी खून बह बह गया। बहुत देर तक तो लोगों की भीड़ लगी रही, लोग देखते रहे किंतु कोई अस्पताल नहीं ले गया। काफी समय बाद पुलिस पहुंची। घायल व्यक्ति को अस्पताल लेकर गई। किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी न होने के कारण डॉक्टरों ने देखते ही उसे रेफर कर दिया। लखीमपुर ले जाते समय उसकी मृत्यु हो गई । लावारिस मानकर उसका दाह संस्कार कर दिया गया । उस व्यक्ति के घर वाले समझ रहे थे कि वह ससुराल में है, ससुराल वाले समझ रहे थे वह अपने घर है। ससुराल और घर के बीच दूरी अधिकतम आठ किलोमीटर थी। चार पाँच दिन बाद खोजबीन शुरू हुई तब पता चल पाया कि व्यक्ति की मौत सड़क दुर्घटना में हो चुकी है। एक नहीं सैकड़ों उदाहरण है ऐसे जो हृदय विहीन मानव की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। हम एक पल भी यह नहीं सोंचते हैं कि घायल व्यक्ति हमारा अपना भी हो सकता है। युवाओं को यह संकल्प लेना होगा उनके होते हुए एक भी व्यक्ति घायल अवस्था में सड़क पर दम नहीं तोड़ेगा बल्कि उसे अस्पताल पहुंचाया जाएगा। उसे सहयोग से बचाने का प्रयत्न भी किया जायेगा। सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकार भी इस पक्ष में है कि घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले व्यक्ति से कोई भी प्रश्न नहीं किया जाएगा न ही पुलिस उसे प्रताड़ित कर सकती हैं फिर भी हम मानसिक रूप से अपने को इतना कमजोर पाते हैं कि घायलों को उसी अवस्था में छोड़ देते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति हमें इस बात की इजाजत नहीं देती है। मानव धर्म हमें इस बात की इजाजत नहीं देता है। घायलों को सड़क पर दम तोडते देखकर हम अपने गाँव समाज और देश का सिर ऊंचा नहीं करते हैं बल्कि ऐसी घटनाएं हमारे देश को विश्व का सिरमौर बनने में बाधक हैं, हमारी महानतम संस्कृति को प्रभावित करती हैं।

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