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मंगलवार, 20 सितंबर 2022

कवि मन का आह्लाद प्रखर, समर्पित करता "समर"

हिंदी बढ़ नही सकती केवल  हिंदी दिवस मनाने से।
भाषा का उत्थान निहित है अद्भुत अलख जगाने से।
कविताओं  में  सार  छिपे हैं हिंदी की  वर्णमाला  से।
भेदभाव  के  भाव   मिटे है  हिंदी  की  मधुशाला  से।
कुरूक्षेत्र  व  रश्मिरथी  ये  पावन  कृतियाँ  हिंदी की।दिनकर और निराला जैसी है कुछ स्मृतियां हिंदी की।

           कवि : कुलदीप श्रीवास्तव "समर"             

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