🔘 नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान : शब्दों से समाज तक, सेवा से संस्कार तक की एक प्रेरक यात्रा
( जनजागरण न्यूज )। कुछ व्यक्तित्व परिचय के मोहताज नहीं होते। उनका जीवन ही उनका परिचय बन जाता है। वे जिस राह पर चलते हैं, वहां केवल पदचिह्न नहीं छोड़ते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा भी निर्मित करते हैं। नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान ऐसा ही बहुआयामी व्यक्तित्व हैं जिनके लिए पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, जनस्वर की अभिव्यक्ति है; साहित्य केवल सृजन नहीं, लोकमन की संवेदना है; अवधी केवल भाषा नहीं, अपनी मिट्टी की आत्मा है और समाजसेवा केवल दायित्व नहीं, जीवन का संस्कार है।
23 नवंबर 1968 को श्री जगदीश सिंह चौहान एवं श्रद्धेय स्व. रामेश्वरी सिंह चौहान के परिवार में जन्मे नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान ने लखनऊ विश्वविद्यालय के क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज से स्नातक शिक्षा प्राप्त की। लखनऊ की धरती और अवध की लोकसंस्कृति ने उनके व्यक्तित्व को जिस गहराई से सींचा, उसका प्रतिबिंब आज उनके लेखन, चिंतन और सामाजिक सरोकारों में स्पष्ट दिखाई देता है।
वर्ष 1992 में पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने के बाद उनकी कलम ने लगभग चार दशकों तक समाज की धड़कनों को महसूस किया। स्वतंत्र भारत से शुरू हुई यात्रा हिन्दुस्तान और कल्पतरु एक्सप्रेस तक पहुंची। इसके साथ ही पाञ्चजन्य, सौम्य भारत, न्यूज वॉच, विश्ववार्ता, लोकसदन, दैनिक जागरण, एनबीटी, ग्राम टुडे, अवध ज्योति, जनसत्ता सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख, कविताएं, कहानियां, हास्य-व्यंग्य और विविध रचनाएं प्रकाशित होती रहीं। आज भी वे ‘अवध ज्योति’ त्रैमासिक पत्रिका के सह-संपादक और ‘न्यूज वॉच’ के उत्तर प्रदेश प्रमुख के रूप में सक्रिय हैं।
उनकी पत्रकारिता की विशेषता यह रही कि उन्होंने समाचार को केवल घटना नहीं माना, बल्कि उसके पीछे छिपे मनुष्य, समाज और संवेदना को भी शब्द दिए। उनकी कलम ने उन आवाजों को स्थान दिया, जो अक्सर भीड़ में दब जाती हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा अखबार के पन्नों तक सीमित नहीं रही। वे आकाशवाणी लखनऊ के वार्ताकार और दूरदर्शन लखनऊ के विषय विशेषज्ञ के रूप में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं समसामयिक विषयों पर अपनी सहभागिता दर्ज करा चुके हैं। प्रथम एवं द्वितीय विश्व योग दिवस के अवसर पर दूरदर्शन ने उनके सामाजिक एवं योग संबंधी कार्यों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘योग की कहानी–बीकेटी की जुबानी’ प्रसारित की जो उनके सामाजिक जीवन की प्रतिबद्धता का उल्लेखनीय दस्तावेज है। यदि उनके व्यक्तित्व की आत्मा को किसी एक शब्द में खोजा जाए तो वह है अवधी। उन्होंने अवधी को केवल साहित्य की भाषा मानकर सीमित नहीं किया, बल्कि उसे लोकजीवन, लोकसंवाद और सामाजिक चेतना से जोड़ने का सतत प्रयास किया। आलेख, वार्ता, कविता, कहानी, नाटक, यात्रा-वृत्तांत और हास्य-व्यंग्य विभिन्न विधाओं में उनकी सक्रियता ने अवधी साहित्य को नई ऊर्जा दी। उनका चर्चित साप्ताहिक स्तंभ ‘चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से’ लोकभाषा की सहजता में समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करता है। वहीं ‘परपंचु लोकभाषाओं को समर्पित ऑनलाइन बतकही’ के माध्यम से वे लोकभाषाओं और लोकसंस्कृति को डिजिटल युग से जोड़ने की सार्थक पहल कर रहे हैं। उनकी सबसे विशिष्ट उपलब्धियों में उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रथम अवधी हिन्दी दुभाषिया के रूप में निभाई गई भूमिका भी शामिल है। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अवधी को लोकतांत्रिक विमर्श के केंद्र तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण अध्याय है। नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान ने योग को केवल व्यक्तिगत साधना के रूप में नहीं देखा। उनके लिए योग स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की आधारशिला है। इसी सोच से उन्होंने ‘स्वस्थ बीकेटी सुन्दर बीकेटी अभियान’ की स्थापना की और संस्थापक अध्यक्ष के रूप में लगातार पांच वर्षों तक निःशुल्क योग शिविरों एवं जनजागरण अभियानों का संचालन किया। इस अभियान के माध्यम से लगभग 16 हजार लोगों को योग प्रशिक्षण देने का प्रयास किया गया। उनकी दृष्टि में योग शरीर को ही नहीं, समाज को भी स्वस्थ करने की साधना है।
नशे के विरुद्ध युवा पीढ़ी के भविष्य की लड़ाई जहां आज नशा युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है, वहां नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान ने जनजागरण को अपना हथियार बनाया। नशामुक्त समाज आंदोलन के प्रांतीय संयोजक के रूप में उन्होंने लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई और जौनपुर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पहुंचकर लगभग 1.50 लाख विद्यार्थियों को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया। लगभग 3,500 लोगों को नशामुक्त जीवन की ओर प्रेरित एवं सहयोग प्रदान करने का प्रयास किया। उनका यह अभियान किसी भाषण की औपचारिकता नहीं, बल्कि उस पीढ़ी को बचाने का संकल्प है जिसके कंधों पर आने वाले भारत का भविष्य टिका है। समाज की आधी आबादी को अवसर दिए बिना समग्र विकास संभव नहीं। इसी विश्वास के साथ उन्होंने महिला कबड्डी लीग ‘हमसे न लो पंगा’ की स्थापना की और संस्थापक अध्यक्ष के रूप में महिला खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच प्रदान किया। खेल के मैदान में बेटियों का आत्मविश्वास, उनके व्यक्तित्व में आत्मनिर्भरता और समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान—इस पहल के पीछे यही व्यापक सोच दिखाई देती है। रामेश्वरी जगदीश योगक्षेम ट्रस्ट से लेकर विभिन्न सामाजिक अभियानों तक उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि समाजसेवा केवल मंचों पर कही जाने वाली बात नहीं, बल्कि जमीन पर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। सामाजिक कुरीतियों, नशाखोरी और अस्वस्थ प्रवृत्तियों के विरुद्ध जनजागरण हो अथवा जरूरतमंद और कमजोर वर्ग की सहायता उन्होंने समाज के बीच रहकर काम करने को प्राथमिकता दी। उनका लक्ष्य स्पष्ट है जागरूक समाज, स्वस्थ समाज और संस्कारित समाज। लगभग चार दशकों की साहित्यिक, पत्रकारिता, सामाजिक और सांस्कृतिक सक्रियता के दौरान उन्हें अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू तथा महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली से जुड़े लुम्बिनी विश्वविद्यालय द्वारा अवधी साहित्यकार के रूप में सम्मानित किया जाना उनकी साहित्यिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। अगस्त 2026 में नेपालगंज में स्वामी तुलसीदास जयंती के अवसर पर उन्हें अवधी साहित्यकार एवं पत्रकार के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री राम नाईक द्वारा उन्हें योग साधक एवं महिला कबड्डी आयोजक के रूप में दो बार सम्मानित किया गया। सम्मान उनके लिए मंजिल नहीं, बल्कि अब तक की यात्रा का सामाजिक स्वीकार है। उनके जीवन की एक भावुक और गौरवपूर्ण कड़ी उनकी पुत्री काव्यांजलि सिंह चौहान ‘वन्या’ से जुड़ी है। उनके योग संबंधी जीवन और उपलब्धियों पर आधारित पाठ ‘योग की गुड़िया वन्या’ सीबीएसई की हिन्दी पाठ्यपुस्तक ‘नव किसलय’ में शामिल किया गया। यह उपलब्धि केवल एक बाल प्रतिभा की कहानी नहीं, बल्कि उस परिवेश की भी कहानी है जहां योग, संस्कार, साहित्य और सामाजिक चेतना जीवन का हिस्सा बनते हैं। नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान को केवल पत्रकार कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे पत्रकार हैं तो जनस्वर के प्रहरी हैं। लेखक हैं तो लोकमन के कथाकार हैं। अवधी साधक हैं तो अपनी मिट्टी की आवाज के संवाहक हैं। योग प्रशिक्षक हैं तो स्वस्थ समाज के स्वप्नद्रष्टा हैं। नशामुक्ति अभियानकर्ता हैं तो युवा भविष्य के प्रहरी हैं। महिला खेल आयोजक हैं तो बेटियों के आत्मविश्वास के साथी हैं। समाजसेवी हैं तो संवेदना को कर्म में बदलने वाले व्यक्ति हैं। उनके जीवन की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उन्होंने अपने सभी कार्यक्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ दिया पत्रकारिता को जनजागरण से, साहित्य को लोकभाषा से, अवधी को लोकसंस्कृति से, योग को स्वास्थ्य से, खेल को महिला सशक्तीकरण से और नशामुक्ति अभियान को युवा संरक्षण से।
कलम चलती रही, कारवां बनता रहा… जंगलवा, रामपुर देवरई से लेकर पत्रकारिता के व्यापक संसार तक की उनकी यात्रा बताती है कि परिवर्तन हमेशा बड़े मंचों से नहीं आता। कभी-कभी एक कलम, एक विचार, एक अभियान और एक संवेदनशील मन भी समाज की दिशा बदलने का साहस कर सकता है। नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान की जीवन-यात्रा इसी विश्वास की कहानी है कि शब्द यदि संवेदना से निकलें तो समाज तक पहुंचते हैं, सेवा यदि निष्ठा से हो तो संस्कार बन जाती है, और जीवन यदि लोकमंगल को समर्पित हो तो व्यक्ति से बढ़कर एक विचार बन जाता है। लगभग चार दशकों से जारी उनकी यह यात्रा अभी पूर्ण विराम नहीं है। यह तो उस दीपक की तरह है जिसकी लौ समय के साथ थकती नहीं, बल्कि अपने आसपास के अंधेरे को थोड़ा और कम करने का संकल्प लेती जाती है। कुलमिलाकर नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान एक नाम नहीं, कलम, संस्कृति, सेवा और संकल्प से बुनी हुई एक जीवंत यात्रा है।
...... ✍️ अनिल कुमार श्रीवास्तव
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