🔘 महाराणा प्रताप जयंती पर स्वाभिमान, शौर्य और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा से गुंजायमान हुआ सरस्वती शिशु मंदिर
लखीमपुर-खीरी। वीरता, त्याग और अदम्य स्वाभिमान के प्रतीक सिसोदिया कुलभूषण महाराणा प्रताप की जयंती के पावन अवसर पर सनातन धर्म सरस्वती शिशु मंदिर, मिश्राना में शनिवार को एक प्रेरणादायी एवं गरिमामयी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। देश की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले महान योद्धा महाराणा प्रताप को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए विद्यालय परिवार ने उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ महाराणा प्रताप के चित्र पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। विद्यालय की प्रधानाचार्या हीरा सिंह ने कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहा कि महाराणा प्रताप केवल इतिहास के एक महान योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्र गौरव, आत्मसम्मान और अटूट साहस के जीवंत प्रतीक हैं। उनके जीवन से प्रत्येक विद्यार्थी को संघर्ष, त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा प्राप्त होती है।
इस अवसर पर आचार्य अखिलेश मिश्र ने महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 9 मई 1540 ईस्वी को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह तथा माता महारानी जयवन्ता बाई थीं। मेवाड़ के 13वें शासक के रूप में उन्होंने 1572 से 1597 ईस्वी तक शासन किया। उन्होंने कभी भी मुगल सम्राट अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया और अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे। यही कारण है कि आज भी महाराणा प्रताप स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक माने जाते हैं।
आचार्य मनीष श्रीवास्तव ने हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के मध्य हुआ युद्ध भारतीय इतिहास में वीरता और आत्मसम्मान की अनुपम मिसाल बन गया। विपरीत परिस्थितियों में भी महाराणा प्रताप ने अपने अदम्य साहस और रणकौशल से यह सिद्ध कर दिया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष ही सच्चे जीवन का धर्म है। पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यालय परिसर राष्ट्रभक्ति और वीर रस की भावनाओं से ओतप्रोत रहा। उपस्थित आचार्य परिवार एवं विद्यार्थियों ने महाराणा प्रताप के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
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