🔘 शब्दों के शिल्पी का गौरवगान, कोटा में डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ का हुआ सारस्वत सम्मान
जनजागरण डेस्क। राजस्थान के सांस्कृतिक नगर कोटा में बीते मंगलवार साहित्य का एक अनुपम उत्सव साकार हुआ, जब प्रख्यात कवि डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ को गरिमामयी सारस्वत सम्मान से अलंकृत किया गया। यह आयोजन केवल एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि शब्दों की साधना और संवेदनाओं की समृद्ध परंपरा का उत्सव बन गया।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ. नलिन कुमार के कुशल मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ, जिसमें सरस काव्य-संध्या ने वातावरण को काव्यमय कर दिया। अध्यक्षता करते हुए डॉ. गिरि गिरिवर ने कहा कि डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की रचनाएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज की आत्मा का प्रतिबिंब हैं जहाँ संवेदनशीलता, सामाजिक यथार्थ और मानवीय मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। समकालीन हिन्दी साहित्य में विशिष्ट पहचान रखने वाले डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने आधुनिक दोहा, हाइकु, लघुकविता, क्षणिका और लघुकथा जैसी विधाओं में अपनी अनूठी शैली से पाठकों के हृदय को स्पर्श किया है। डॉ. नलिन कुमार ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समकालीन दोहा आंदोलन को समृद्ध करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणास्पद है। कार्यक्रम का सजीव और प्रभावी संचालन रामेश्वर शर्मा (रामू भैया) ने किया, जिन्होंने अपने व्यंग्यपूर्ण अंदाज़ में डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की साहित्यिक यात्रा और उनकी अंतर्राष्ट्रीय पहचान को रेखांकित किया। द्वितीय सत्र में आयोजित काव्य-संध्या में डॉ. नलिन कुमार, गिरि गिरिवर, भगवती प्रसाद गौतम, रामेश्वर शर्मा (रामू भैया), विष्णु शर्मा ‘हरिहर’, शैलेष गुप्त ‘वीर’, नंद किशोर शर्मा ‘अनमोल’, योगीराज योगी, डॉ. कृष्णा कुमारी ‘कमसिन’ और राधेश्याम शर्मा सहित सभी कवियों ने अपने सृजन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण बना कि जब शब्द साधना से जुड़ते हैं, तो वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते वे समाज को दिशा देने वाली शक्ति बन जाते हैं। डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ का यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य जगत के लिए प्रेरणा का उज्ज्वल दीप भी है।
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