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शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

#MotivationalStory गाँव से ग्लोबल मंच तक : अमित कृष्ण की साधना, संघर्ष और सफलता की कहानी

🔘 गाँव से ग्लोबल मंच तक : अमित कृष्ण की साधना, संघर्ष और सफलता की कहानी

कुछ जीवन ऐसे होते हैं जो केवल जिए नहीं जाते, वे रचे जाते हैं। जिनकी हर साँस में संघर्ष, हर कदम में साधना और हर शब्द में सृजन बसता है। ऐसा ही एक प्रेरक व्यक्तित्व है अमित कुमार पांडेय “अमित कृष्ण”।

बिहार के शांत, संस्कारवान और सांस्कृतिक भूमि रामपुर मिलकी गाँव में जन्मे अमित कृष्ण की जीवन यात्रा सादगी, संस्कार और सेवा की परंपरा में पली-बढ़ी। एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में जन्मे अमित के दादा, स्वर्गीय रामजनम पांडेय, पुलिस विभाग में अपनी ईमानदार सेवाओं के लिए जाने जाते थे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने शिक्षा को समाज निर्माण का आधार मानते हुए ‘पं. हरी चरण पांडेय सह मध्य विद्यालय’ की स्थापना की जो आज भी ज्ञान का दीप जलाए हुए है। इसी विद्यालय में उनके पिता, स्वर्गीय कृष्ण दत्त पांडेय, शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे। वे केवल अध्यापक नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों के संवाहक थे। शिक्षा के साथ सामाजिक सेवा उनके जीवन का मूल मंत्र थी। माता पुष्पा देवी एक आदर्श गृहिणी के रूप में परिवार की आत्मा हैं, जिनकी ममता और संस्कारों ने अमित के व्यक्तित्व को गढ़ा। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे अमित, स्नेह, संस्कार और संघर्ष तीनों का अद्भुत संगम हैं। बाल्यकाल से ही लेखन अमित की आत्मा में बसता चला गया। शब्दों से संवाद करना, भावों को कागज़ पर उतारना, उन्हें अपार सुख देता। हिंदी गीत-संगीत और फिल्मों के प्रति उनका अनुराग गहन रहा। खेलों में क्रिकेट उनका प्रिय रहा, जिसमें वे कुशल खिलाड़ी भी रहे। शिक्षा के क्षेत्र में अमित कृष्ण की यात्रा अनुशासन, परिश्रम और समर्पण की मिसाल है। संस्कृत विद्यालय से प्रारंभ हुई उनकी शिक्षा डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल तक पहुँची। आरा स्थित हर प्रसाद दास जैन स्कूल से उन्होंने प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल उत्तीर्ण किया। इसके बाद हर प्रसाद दास जैन कॉलेज से स्नातक तथा महाराजा कॉलेज से स्नातकोत्तर और विधि (LLB) की डिग्री अर्जित की। कला-साधना के क्षेत्र में उन्होंने प्रयागराज संगीत विद्यालय से प्रभाकर की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात माँ आरण्या देवी कॉलेज से B.Ed. की डिग्री प्रथम श्रेणी में हासिल की। एमिटी यूनिवर्सिटी में एमबीए के लिए चयन उनके परिश्रम का प्रमाण था, परंतु नियति को कुछ और मंज़ूर था। पिता के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने पर अमित ने बिना किसी हिचकिचाहट अपने सपनों को विराम दिया और घर लौट आए। पार्किंसन रोग से ग्रसित पिता की अंतिम साँस तक उन्होंने निःस्वार्थ सेवा की। पिता के निधन के बाद, पैतृक आम के बगीचों को बचाने के लिए उन्होंने दो वर्षों तक आरा व्यवहार न्यायालय में वकालत का अभ्यास किया। यह संघर्ष केवल संपत्ति का नहीं था यह विरासत, सम्मान और आत्मसम्मान की रक्षा का युद्ध था, जिसमें वे विजयी हुए।
 इसी दौरान उन्होंने अनेक ज़रूरतमंदों को कानूनी सहायता देकर मानवता की मिसाल भी कायम की। दिल्ली आगमन उनके जीवन का नया अध्याय बना। कोविड काल में उन्होंने StarMaker म्यूजिक ऐप से जुड़कर अपने गायन-सफर को पंख दिए। ‘चाहत’ नामक अपने म्यूजिकल ग्रुप के माध्यम से अब तक वे 3900 से अधिक गीत गा चुके हैं। यहीं उन्हें ऐसे साहित्यप्रेमी साथी मिले जिन्होंने उनके भीतर के लेखक को नई उड़ान दी। इसी प्रेरणा से जन्मी उनकी पहली काव्य कृति  ‘चाहत की बगिया’, जो प्रेम, संवेदना और जीवन-दर्शन की सुगंध से सराबोर है। आज अमित कृष्ण एक कंपनी में विधिक सलाहकार के रूप में वर्क फ्रॉम होम कार्य कर रहे हैं तथा सायंकाल एक एकेडमी में बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। इन व्यस्तताओं के बीच उनका लेखन और गायन सतत सृजनशील बना हुआ है। अमित कुमार पांडेय “अमित कृष्ण” का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि संघर्ष से ही संकल्प जन्म लेता है, और संकल्प से सृजन। उनकी यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वप्नों को जीवित रखना चाहता है। उनकी लेखनी संवेदना जगाती है, उनका स्वर आत्मा को स्पर्श करता है, और उनका जीवन साहस का पाठ पढ़ाता है। वास्तव में, अमित कृष्ण केवल एक नाम नहीं एक प्रेरणा हैं।

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