Breaking

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

विश्लेषण : ‘एप्स्टीन फाइल्स’ पर उलटी पड़ी विपक्ष की सियासत


🔘 विपक्ष को पड़ सकता है लेने के देने?

 🔘 राहुल गांधी पर हो सकता है एक और मानहानि का मुकदमा! 

🔘 हरदीप सिंह पुरी ने ‘एप्स्टीन फाइल्स’ के आरोपों को तथ्यों से किया ध्वस्त

विवेक अवस्थी। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन तथ्यों की कसौटी पर खरा उतरना कठिन। तथाकथित “एप्स्टीन फाइल्स” को लेकर जिस तरह विपक्ष ने केंद्र सरकार और विशेष रूप से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को घेरने की कोशिश की, वह अब उलटी पड़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बिना ठोस प्रमाण लगाए गए आरोप अब कानूनी चुनौती का रूप ले सकते हैं, और राहुल गांधी पर एक और मानहानि का मुकदमा दायर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।

शनिवार को हरदीप सिंह पुरी ने बेहद स्पष्ट, संयमित और तथ्यों पर आधारित जवाब देते हुए आरोपों को न केवल खारिज किया, बल्कि उन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित और भ्रामक बताया। पुरी ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने कभी भी कुख्यात वित्तीय कारोबारी जेफ्री एप्स्टीन से मिलने की पहल नहीं की। उनका कहना है कि जिन सीमित ईमेल संवादों का हवाला दिया जा रहा है, वे संस्थागत और औपचारिक प्रक्रियाओं के तहत हुए थे और उस समय एप्स्टीन के आपराधिक कृत्यों का पूरा सच सार्वजनिक नहीं था। “मैंने किसी बैठक का अनुरोध नहीं किया था। यह संवाद आधिकारिक मंचों के माध्यम से तय हुआ था। ईमेल्स के चुनिंदा अंशों से तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा नहीं जा सकता,” पुरी ने स्पष्ट कहा। चयनात्मक राजनीति, कमजोर आधार अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक किए गए करोड़ों दस्तावेजों में पुरी का नाम कथित रूप से कुछ ही बार आता है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह तथ्य अपने आप में दर्शाता है कि पूरे मामले को राजनीतिक रंग देकर बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पुरी ने यह भी रेखांकित किया कि उस समय उनका भारतीय जनता पार्टी से कोई संबंध नहीं था। वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आर्थिक, तकनीकी और निवेश संभावनाओं को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने एप्स्टीन के निजी द्वीप पर जाने या उसके विमान में यात्रा करने जैसे आरोपों को सिरे से खारिज किया। इतना ही नहीं, जब बाद में कुछ व्यक्तियों से जुड़े विवाद सामने आए, तो उन्होंने इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट से जुड़े अपने संपर्क भी समाप्त कर दिए जो उनके नैतिक और सतर्क सार्वजनिक आचरण को दर्शाता है। राहुल गांधी के लिए कानूनी जोखिम? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बिना ठोस प्रमाण किसी केंद्रीय मंत्री पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो वह मानहानि के दायरे में आ सकता है। पहले भी राहुल गांधी को अपने बयानों के चलते कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह विवाद उनके लिए एक और कानूनी जोखिम बन सकता है। सरकार समर्थकों का तर्क है कि व्यक्तिगत आरोपों की राजनीति, खासकर अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों के चयनात्मक हवाले के आधार पर, विपक्ष की रणनीतिक हताशा को दर्शाती है। उनका कहना है कि संसद को नीतिगत बहस का मंच बनाने के बजाय उसे राजनीतिक रंगमंच में बदलना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। संसद या सुर्खियों की राजनीति? सत्तापक्ष का आरोप है कि विवाद का समय भी संदेह पैदा करता है जब संसद में महत्वपूर्ण विधायी कार्य और आर्थिक सुधारों से जुड़े मुद्दे चर्चा में थे। ऐसे समय में सनसनीखेज आरोपों के जरिए माहौल गरमाना क्या वास्तव में जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास था, या सिर्फ सुर्खियां बटोरने की रणनीति? पारदर्शिता और सार्वजनिक जीवन, हरदीप सिंह पुरी ने दोहराया कि उनका सार्वजनिक जीवन पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित रहा है। उनका कहना है कि उस दौर में उनका पूरा ध्यान भारत की विकास गाथा को आगे बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और वैश्विक मंचों पर देश की साख मजबूत करने पर केंद्रित था। “सत्य को शोर से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। तथ्य स्वयं बोलते हैं,” पुरी ने कहा। विवाद की धूल बैठने के साथ यह स्पष्ट होता जा रहा है कि संकेतों और आधे अधूरे तथ्यों पर आधारित राजनीति कई बार उलटी पड़ सकती है। यदि विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो यह प्रकरण उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकता है और संभव है कि कानूनी मोर्चे पर भी उसे जवाब देना पड़े।

🔘 (विवेक अवस्थी वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में indianpsu.com के मुख्य संपादक हैं। यह उनका निजी विश्लेषण

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Comments