लखीमपुर शहर की बीती रात ने एक बार फिर यह सवाल उछाल दिया, क्या कानून सबके लिए बराबर है, या किसी एक के लिए ही बना है?
घड़ी ने जैसे ही रात के दस बजाए, शहर की कई प्रमुख सड़कें बाराती धुनों, तेज़ डीजे और आतिशबाज़ी के धमाकों से गूंज उठीं। खुशियों के ये जुलूस जब सड़कों पर उतरे, तो शहर की सांसें थम-सी गईं। हर ओर जाम का झाम, गाड़ियों की कतारें और बीच में फंसी ज़िंदगी, एक एम्बुलेंस, जो सायरन बजाती रही, पर रास्ता न मिला। विडंबना यह कि एक दिन पहले ही इसी मुद्दे पर पुलिस ने एक मैरिज लॉन संचालक पर मुकदमा दर्ज किया था। उसी दिन सदर कोतवाली ने गेस्ट हाउस और डीजे संचालकों को सख़्त हिदायतें भी दी थीं “सड़क बाधित न हो।” फिर सवाल उठता है क्या नियम सिर्फ एक के लिए थे?
या फिर बाकी बारातें किसी अदृश्य छूट के साए में थीं? सलेमपुर कोन इलाके में देर रात तक लगा जाम इस लापरवाही का जीवंत प्रमाण बना रहा। सड़क पर ठहरी गाड़ियाँ, फंसी एम्बुलेंस और तमाशबीन भीड़ मानो व्यवस्था ने आंखें मूंद ली हों। यही हाल आनंद टॉकीज रोड, मेला मैदान रोड का रहा। उधर शादी सीजन की शुरुआत के साथ ही शहर हर रात “जाम-उत्सव” में तब्दील होता जा रहा है। शहर के कई मैरिज लॉन ऐसे हैं जहाँ पार्किंग की व्यवस्था या तो नदारद है या इतनी दूर कि कोई जाए ही नहीं। नतीजा, मेहमान अपनी गाड़ियाँ वेन्यू के आसपास ही सजा देते हैं। ऊपर से उन्हीं सड़कों पर बारातों के जुलूस निकलते हैं। और फिर? शहर का ट्रैफिक, बारात, और बेतरतीब पार्किंग तीन सिरों वाली भीड़, जो हर रात जाम के भंवर में गोते लगाती दिखती है। पुलिस प्रशासन शादी सीजन से पहले तैयारियों का ढोल पीटता ज़रूर है, पर ज़मीनी हक़ीक़त में ये तैयारियाँ महज़ काग़ज़ी बानगी बनकर रह जाती हैं। कार्रवाई कहीं दिखती है, तो कहीं अदृश्य हो जाती है। और इसी असमानता से जन्म लेता है अविश्वास, कानून पर भी, व्यवस्था पर भी। लखीमपुर की रातें आज एक तीखे व्यंग्य की तरह सवाल पूछ रही हैं खुशियाँ मनाने का हक़ है, पर क्या शहर को जाम करने का लाइसेंस भी? और अगर नियम हैं, तो क्या वे सबके लिए हैं… या सिर्फ़ नाम के लिए?
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