लखीमपुर, 13 नवम्बर 2025। समर्पण, सहयोग और स्नेह की डोर से बंधा “खत्री महिला संगठन” जब अपने 34वें स्थापना दिवस पर पहुंचा, तो यह अवसर केवल उत्सव नहीं, बल्कि मानवता और ममता का पर्व बन गया।
इस आयोजन ने बाल दिवस को नई परिभाषा दी, जब समाजसेवा की मशाल थामे इन महिलाओं ने मूक-बधिर विद्यालय के नन्हे बच्चों संग खुशियों की वर्षा की। दीप प्रज्वलन और श्रीराम आराधना से प्रारंभ हुए कार्यक्रम में बच्चों ने मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। उनकी हँसी, उनका उत्साह, और उनका आत्मविश्वास पूरे वातावरण में उजाला भर गया। संगठन की सदस्यों ने बच्चों के साथ केक काटा, खेल खेले और उपहार बाँटकर यह संदेश दिया कि सच्ची खुशी बाँटने में है, न कि पाने में।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मूक-बधिर विद्यालय अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार तोलानी, विशिष्ट अतिथि सुनीता तोलानी, संस्थापक प्रधानाचार्य रामदुलारे वर्मा, शिक्षिका सरिता एवं अन्य शिक्षक उपस्थित रहे। संगठन की परंपरा के अनुरूप इस अवसर पर समाजसेवा और सांस्कृतिक कार्यों में विशेष योगदान देने वाले समाजसेवियों का सम्मान किया गया।
सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के माध्यम से 168 वर्षों से चली आ रही रामलीला परंपरा को जीवित रखने वाले विपुल सेठ एवं अनामिका सेठ, कैलाश नाथ सेठ एवं किशोरी सेठ, विभु सेठ एवं प्रीति सेठ, अमित सेठ, और अभिषेक सेठ को विशेष सम्मान प्रदान किया गया। कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने में वरिष्ठ पदाधिकारी सविता चोपड़ा की उपस्थिति रही। मुख्य अतिथि श्री तोलानी ने संगठन की नारी शक्ति की सराहना करते हुए कहा ऐसे आयोजन समाज में संवेदना और समरसता के दीप जलाते हैं। कार्यक्रम की आयोजिका वंदना बत्रा रहीं, जिन्होंने अपने प्रतिष्ठान पर बच्चों के लिए जलपान और मनोरंजन की सुंदर व्यवस्था की। संगठन की अध्यक्ष रश्मि महेन्द्रा ने वंदना बत्रा, श्री तोलानी दंपति को विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया। संगठन की अध्यक्षा रश्मि महेन्द्रा एवं सचिव कविता शेखर ने अपने भावनाओं को इन शब्दों में व्यक्त किया हमारा स्थापना दिवस और बाल दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि सेवा, प्रेम और संवेदना का प्रतीक हैं। एकता, मानवता और सहयोग ही हमारी संस्था की असली शक्ति हैं। तीन दशकों से अधिक समय से “खत्री महिला संगठन” ने समाज में नारी सशक्तिकरण, शिक्षा, और सेवा की अलख जलाए रखी है। इस विशेष दिन पर, जब मूक-बधिर बच्चों की मुस्कानें इन समाजसेविकाओं की आँखों में चमक बनकर झलकीं, तो यह आयोजन केवल स्मृति नहीं, बल्कि मानवता की जीवंत मिसाल बन गया। कुलमिलाकर यह दिन नारी संवेदना, समाजसेवा और मासूम बचपन की मुस्कानों का संगम बन गया जहाँ हर हृदय ने अनुभव किया कि प्रेम जब कर्म बनता है, तो वही सेवा सच्ची पूजा कहलाती है।
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