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रविवार, 9 जून 2024

कर्नाटक को छोड़कर लगभग सभी दक्षिणी राज्यों में भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा

 इस बार भाजपा को अपने बल पर पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका है,एनडीए गठबंधन को हासिल अल्प बहुमत के बल पर वह किसी तरह केंद्र की सत्ता पर आसीन होने जा रही है, लेकिन दक्षिण भारत में हासिल बढ़त को वह अपनी उपलब्धि के तौर पर गिना सकती है। 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस को हासिल जबर्दस्त सफलता के बावजूद भाजपा 28 में से 17 सीटों पर अपनी जीत को एक बड़ी सफलता मान सकती है। इसी तरह केरल में त्रिसूर सीट जीतकर पहली बार पार्टी ने अपना खाता खोला है। तेलंगाना में आश्चर्यजनक तरीके से आठ सीटें जीतकर भाजपा ने न सिर्फ कांग्रेस के बराबर सीटें हासिल करने में सफल रही बल्कि 2019 की तुलना में अपनी सीटों की संख्या को दोगुना कर पाने में समर्थ रही है। 2019 में आंध्र प्रदेश में जहां भाजपा का खाता भी नहीं खुल पाया था, इस बार छह सीटों पर लड़कर दो सीटें जीतने में सफल रही है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि कर्नाटक को छोड़कर लगभग सभी दक्षिणी राज्यों में भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ है।
तमिल नाडु में भी 2019 के 3.58% की तुलना में यह बढ़कर 11.24% पहुंच चुका है।
आंध्र प्रदेश में तो 2019 के 0.98% की तुलना में 2024 में यह 11.28% जा पहुंचा है।
तेलंगाना में 2018 के 19.65% वोट प्रतिशत की तुलना में 2024 में यह 35.08% जा पंहुचा है।
एकमात्र कर्नाटक राज्य में 2019 के 51.38% वोट प्रतिशत की तुलना में यह 2024 में घटकर 46.06% हो चुका है।
भाजपा के दक्षिणी राज्यों में चुनावी उपस्थिति को बढ़ाने में क्या करक रहे हैं? आइये राज्यवार तरीके से भाजपा की दक्षिणी रणनीति की समीक्षा करते हैं।भाजपा समर्थक मीडिया को देखें तो वह कर्नाटक में भाजपा के 28 में से 17 सीटों पर जीत को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना रही है। शायद उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी क्योंकि सिद्धारमैया के तहत कांग्रेस सरकार ने महिलाओं के लिए फ्री बस सेवा और मासिक आर्थिक समर्थन जैसे पांच गारंटियों को जारी कर अपने पक्ष में माहौल बना रखा था।
एक प्रमुख नागरिक समाज से जुड़े एक प्रमुख सख्शियत लोकेश नाइक ने बताया कि इस चुनाव में सिर्फ भाजपा को ही एकतरफा लाभ नहीं हुआ है। उनके मुताबिक़, “अगर किसी को फायदा हुआ है तो वह कांग्रेस है, क्योंकि 2019 में उसे सिर्फ 1 सीट पर जीत हासिल हुई थी, जबकि इस बार उसने 9 सीटें जीती हैं। कांग्रेस के वोट प्रतिशत में भी इजाफा हुआ है। 2019 में कांग्रेस को हासिल 32.11% वोट की तुलना में 2024 में यह बढ़कर 45.43% हो चुका है, जबकि भाजपा के वोट प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है। 2019 में भाजपा ने राज्य की 28 सीटों में से 25 पर जीत दर्ज की थी, जबकि इस बार यह संख्या 17 पर आकर सिमट चुकी है।”
सत्ता में बने रहने के बावजूद कांग्रेस सिर्फ 9 सीट पर क्यों सिमट गई, जबकि बीजेपी तकरीबन दोगुनी सीट जीतने में कामयाब रही? क्या सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ किसी प्रकार की सत्ता-विरोधी लहर काम कर रही थी? इस प्रश्न के जवाब में राय भिन्न-भिन्न है।मनोहर चंद्र प्रसाद और लोकेश नाइक जैसे सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं का मानना है कि प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर जैसी चीज नहीं थी। उनके अनुसार, पिछले तीन दशक से राज्य में यह प्रवृत्ति बनी हुई है कि राज्य में अगर किसी एक पार्टी को कमान सौंपी है तो केंद्र की सत्ता पर किसी अन्य के पक्ष में वोट देना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ, कोलार के एक प्रमुख विद्वान, वीएसएस शास्त्री के मुताबिक, इस बार भाजपा के प्रदर्शन के पीछे लिंगायत और वोक्कालिगा जैसी दो उच्च जाति का एकजुट हो जाना रहा है।वोक्कालिगा बेल्ट के मांड्या-हासन-बेंगलुरु ग्रामीण-तुमकुर जिलों में वोक्कालिगा (जिन्हें गौड़ा के तौर पर भी जाना जाता है) के बीच में देवगौड़ा के हाशिये पर चले जाने की वजह से सहानुभूति की लहर थी। वरुणा नहर के निर्माण में देवगौड़ा की मुख्य भूमिका रही है, जिसकी वजह से वोक्कालिगा बेल्ट में 2 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचाई-युक्त हो जाने से ज्यादातर वोक्कालिगा किसानों को इसका लाभ पहुंचा है। इसकी वजह से उनकी आय में दोगुने से अधिक का इजाफा हुआ है।
अजीब इत्तफाक है कि प्रज्वल रेवन्ना जो कि अपनी सीट हार चुके हैं, हालांकि उनके नाम से जुड़े सेक्स स्कैंडल की खबर फैलने से पहले ही उस सीट पर चुनाव संपन्न हो चुका था, लेकिन इतने बड़े विस्फोट के बावजूद वोटों में कोई खास गिरावट देखने को नहीं मिली है। मीडिया में जबर्दस्त हड़कंप के बावजूद, शहरी क्षेत्रों में जमीन पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा।
आख़िरकार भाजपा कैसे बेंगलुरु शहर की सभी तीनों सीटों को (और अगर बेंगलुरु ग्रामीण को भी जोड़ दें तो 4) जीतने में कामयाब रही? क्या कर्नाटक में मध्य वर्ग भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ा रहा, और अपनी लोकप्रिय योजनाओं के बावजूद कांग्रेस उस प्रभाव को निस्तेज कर पाने में विफल रही? लोकेश नाइक का इस बारे में कहना है कि बेंगलुरु पारंपरिक रूप से हमेशा भाजपा के पक्ष में वोट करता आया है।हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि बोम्मई सरकार के दौरान मध्य वर्ग के बीच में हिजाब, हलाल मीट और गिरिजाघरों पर हमलों की घटनाएं हुई थीं, और जिस प्रकार की सांप्रदायिक उभार की प्रवृत्ति देखने को मिली थी, वैसा कुछ इस बार नहीं था और 17 लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा की इस जीत में किसी प्रकार के सांप्रदायिक पुनरुत्थान की संभावना नहीं देखने को मिली है।
हालांकि जिन लोगों से भी बात की उन सभी की राय में कांग्रेस पार्टी का सांगठनिक आधार भाजपा की चुनावी मशीनरी की तुलना में कमजोर है। पिछले आठ वर्षों से शहरी नगर निगम के चुनाव नहीं हुए हैं और कांग्रेस ने अभी तक जमीनी स्तर वाले अपने कार्यकर्ताओं की ब्रिगेड का निर्माण नहीं किया है। अभी भी यह ऐसे नेताओं की पार्टी बनी हुई है जो लोगों के साथ कनेक्ट स्थापित करने के मामले में “राजनीतिक सामंत” के तौर पर नजर आते हैं। सत्ता विरोधी लहर के तौर पर इन कारकों को गिना जाना चाहिए।तेलंगाना में अगर 2019 और 2024 के बीच में भाजपा सांसदों की संख्या 4 से दोगुनी होकर 8 हो गई है तो कांग्रेस की सीटें भी 3 से दोगुनी से अधिक होकर 8 हो गईं हैं। इसमें सबसे बड़ा नुकसान बीआरएस को हुआ है, जिसके पास मौजूद सभी 9 सीटें यह गंवा चुकी है। इस पार्टी का अब करीब-करीब सफाया हो चुका है। चुनाव कभी-कभी पार्टियों को ध्वस्त भी कर सकने की काबिलियत रखते हैं।केसीआर सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर तो सबको मालूम थी और हमने देखा है कि किस प्रकार, इस सत्ता विरोधी लहर पर सवार होकर कांग्रेस दिसंबर 2023 में सत्ता में आई थी। ऐसे में, तेलंगाना के चुनावी नतीजों से सामने उभरा केंद्रीय मुद्दा यह है कि आखिर कांग्रेस क्यों अपनी दिसंबर 2023 की जीत के सिलसिले को बरकरार रखने में कामयाब नहीं हो पाई। किसी भी बड़े सत्ता-विरोधी लहर को पनपने के लिए छह माह की अवधि बेहद कम होती है।असल बात तो यह है कि तेलंगाना कांग्रेस सरकार ने इस दौरान कई आकर्षक कल्याणकारी योजनाएं आरंभ की थीं। इसके बावजूद ऐसा क्या हुआ? क्या राज्य स्तर पर एक पार्टी और केंद्र में दूसरी पार्टी को वोट देने की प्रवृत्ति, या दूसरे शब्दों में कहें तो कथित “डबल इंजन सरकार” को ख़ारिज करने की प्रवृत्ति ही कहीं तेलंगाना के मतदाताओं के बीच ज्यादा प्रमुखता लिए हुए थी?असल में भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट शेयर में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन बीजेपी के वोट शेयर में जहां 15.43% की बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं कांग्रेस का वोट शेयर सिर्फ 10.31% ही बढ़ पाया है। इसकी व्याख्या करने के लिए सत्ता-विरोधी लहर काफी कठोर शब्द होगा, लेकिन निश्चित रूप से तेलंगाना में रेवंत रेड्डी सरकार के खिलाफ थोड़ी-बहुत निराशा लगती है। कांग्रेस के लिए लोकसभा के परिणाम अपने भीतर एक आवश्यक सुधार की पूर्व-चेतावनी कही जा सकती है।
आंध्र प्रदेश में भाजपा की 2 सीटों पर जीत का सारा श्रेय असल में टीडीपी को दिया जाना चाहिए। अगर भाजपा ने आंध्र प्रदेश में टीडीपी के साथ गठबंधन के बगैर अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ा होता, तो उसके लिए नतीजा शून्य होता क्योंकि राज्य में भाजपा का अपना कोई स्वतंत्र जनाधार नहीं है।जगन मोहन रेड्डी की बर्बादी के पीछे जगन की अदूरदर्शिता और राज्य की राजनीति में रायलसीमा के गैंगस्टरवाद से परिचय कराने वाले कारक जिम्मेदार हैं। सिर्फ राजनीतिक प्रतिशोध की वजह से चंद्रबाबू नायडू को जेल में डालने का फैसला स्पष्ट रूप से आंध्र के लोगों मंजूर नहीं था। यही वजह है कि रेड्डी सरकार के द्वारा कतिपय नवोन्मेषी कल्याणकारी योजनाओं, विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं के बावजूद 5 वर्षों में वाईएसआरसीपी की लोकसभा की सीटें 22 से घटकर 4 रह गईं हैं और वोट-शेयर भी करीब 10% गिरकर 49.89% से 39.61% हो चुका है, जो कि जबर्दस्त गिरावट है।यह सरकार की ओर से की गई आधिकारिक गुंडागर्दी के अतिरिक्त कई मुद्दों पर मजबूत सत्ता विरोधी लहर को दर्शाता है। यह आतंक इतना अधिक था कि व विपक्षी दल शांतिपूर्ण रैली तक नहीं निकाल सकते थे। न सिर्फ टीडीपी जैसे विपक्षी दल बल्कि सरकारी कर्मचारियों एवं बिजली कर्मचारियों के क्षेत्रीय मुद्दों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों तक को सत्तारूढ़ पार्टी की गुंडागर्दी से दो-चार होना पड़ा था। आंध्र की जनता स्पष्ट रूप से गुंडों को सत्ता में बिठाने के पक्षधर नहीं थे।
यहां पर भाजपा ने सत्तारूढ़ वाईएसआरसीपी सरकार के बजाय विपक्षी टीडीपी के साथ गठबंधन करने की चतुराई दिखाई, क्योंकि उसे जगन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर साफ़ नजर आ रही थी।हालांकि, जगन की हार में कहीं ज्यादा निर्णायक कारक को टीडीपी और जन सेना पार्टी के साथ भाजपा के गठबंधन में संख्या के लिहाज से उच्च जाति में सबसे बड़ी संख्या वाले कापू समुदाय की जातिगत पहचान के आधार को अपने पक्ष में करना कहा जा सता है। प्रशासन और कृषि अर्थव्यस्था में अपनी मजबूत पकड़ के बावजूद संख्या के लिहाज से बेहद कम आधार रखने वाले रेड्डी समुदाय के लिए जन सेना और टीडीपी के कापू-खम्मा गठबंधन की ताकत कहीं ज्यादा दुर्जेय सामाजिक शक्ति के तौर पर उभरी है।
पूर्व में चंद्रबाबू को किसानों की उपेक्षा और विशेषकर अपना सारा जोर शहरी व्यवसायों, उसमें भी हैदराबाद पर केंद्रित रखने की भारी कीमत राजनीतिक तौर पर चुकानी पड़ी थी। अब अपने नए कार्यकाल में चंद्रबाबू के पास आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद हैदराबाद पर जो भी थोड़ा-बहुत दावा था, उसे वे खो चुके हैं। ऐसे में क्या अब वे अमरावती या विशाखापत्तनम में नई राजधानी की मुहिम को आगे बढ़ाएंगे, और इस प्रक्रिया में क्या वे विजयवाड़ा-गुंटूर-तेनाली त्रिकोण के खम्मा समुदाय के गढ़ की उपेक्षा को वहन कर सकते हैं, जहां की ताकतवर खम्मा बिजनेस लॉबी भी अपने भीतर उच्च महत्वाकांक्षाओं को पाले बैठी है? आने वाले दिनों में यह मुद्दा नायडू के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है।
व्यापक राजनीतिक हलकों में भाजपा के लिए केरल में एक सीट जीतकर अपना खाता खोलने को ही एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है। देश का मीडिया इस बात पर चर्चा कर रहा है कि किसी भी पार्टी के लिए केरल में सीपीआई (एम) के मजबूत गढ़ में बढ़त हासिल कर पाना कितना दुष्कर कार्य है। पिछले दो दशक से भाजपा तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट को लेकर दिन-रात मेहनत कर रही थी। वहीं आरएसएस ने खुद को सीपीआई (एम) के साथ हत्याओं और प्रति-हत्याओं के चक्र में फंसा रखा है। इसके बावजूद, चुनावी सफलता से वे अभी तक कोसों दूर थे। ऐसी पृष्ठभूमि में, अगर एक लोकप्रिय अभिनेता लेकिन राजनितिक तौर पर नौसिखिये के रूप में सुरेश गोपी को भाजपा ने त्रिसूर से चुनावी मैदान में उतारा, जो केरल में भाजपा को किसी भी प्रकार की नवोन्मेषी रणनीति को अपनाए बगैर ही ऐतिहासिक पहली जीत दिलाने में सक्षम है, तो यह साफ़ बताता है कि पृष्ठभूमि में पिनाराई विजयन का राजनीतिक पतन कितना घनीभूत हो चुका है, जो केरल में कांग्रेस की भारी जीत के तौर पर प्रदर्शित हो रहा है।भारत में विदेश प्रवासन का सर्वोच्च स्तर केरल में होने के बावजूद, केरल में बेरोजगारी की समस्या जस की तस बनी हुई है। राज्य सरकार विशेषकर शिक्षित युवा बेरोजगारी के मुद्दे को सुलझाने में असमर्थ है। ऊपर से महंगाई की मार, जो कि अखिल भारतीय परिघटना है, का बोझ भी पिनाराई पर पड़ा है। तकनीकी तौर पर कुशल श्रमबल की मौजूदगी के बावजूद भूमि एवं श्रम की उच्च लागत और अन्य कच्चे माल के लिए उच्च परिवहन लागत ने केरल में पारंपरिक औद्योगीकरण को बेहद कठिन बना दिया है।बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर पहले से ही आईटी एवं अन्य हाई-टेक उद्योगों में अग्रणी हैं, जिसमें केरल साफ़ तौर पर पीछे रहा गया है। भूमि सुधार, प्रशासन नवाचार, पंचायती राज और कुदुम्बश्री जैसे शासन के लोकतंत्रीकरण को यदि छोड़ दें तो केरल में वामपंथ उच्च आर्थिक विकास को हासिल कर पाने में पूरी तरह से विफल साबित हुई है। सहकारी समितियों जैसे पारंपरिक सामाजिक उद्यमों में उल्लेखनीय प्रयोगों को अपनाने के बावजूद, इन समितियों पर सीपीआई (एम) के वर्चस्व के चलते वे ठहरी हुई हैं।सीपीआई (एम) उन्हें फिर से पुनर्जीवित करने के लिए नई ऊर्जा दे पाने में विफल साबित हुई है। वर्तमान चुनाव परिणामों से यह आशंका जन्म लेने लगी है कि क्या केरल के लोग भी केरल मॉडल के बावजूद पश्चिम बंगाल के लोगों की तरह “कैडर राज” को ख़ारिज करने के लिए उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने की ओर अग्रसर हैं। वामपंथी अधिनायकवाद लंबे समय तक काम नहीं करता। यह अपनी सीमाएं खोजने के लिए बाध्य है।
हमें आशा करनी चाहिए कि अखिल भारतीय स्तर पर असहाय अवस्था में पड़े वामपंथी नेतृत्व, वामपंथी तानाशाह पिनाराई के चुनावी दुर्भाग्य पर सिर्फ कुछ दुर्भावनापूर्ण खिलखिलाहट में शामिल होने के बजाय आत्मनिरीक्षण में जाएं और इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, केरल मॉडल 2.0 के लिए नवोन्मेषी विचारों के साथ आगे आयेंगे।तमिलनाडु की सभी 39 सीटों के साथ-साथ पुडुचेरी की एकमात्र सीट पर डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत के अतिरेक में कुछ ऐसे घटनाक्रम छिपे हैं, जिनसे द्रविड़ ताकतों को चिंतित होने की जरूरत है। यहां ध्यान देने की जरूरत है कि बड़बोले बीजेपी नेता अन्नामलाई भले ही कोयंबटूर सीट से अपना चुनाव हार चुके हों लेकिन वे 4.5 लाख वोट हासिल करने में सफल रहे हैं।याद रखें, तमिलनाडु में भाजपा का घोषित दूसरे स्थान पर आने का था, ताकि अन्नाद्रमुक को तीसरे स्थान पर धकेल कर वह मुख्य विपक्ष की पार्टी बन जाये। हालांकि वे 39 में से सिर्फ 16 निर्वाचन क्षेत्रों में ही इसे हासिल कर पाने में सफल हो सकी। इसके बावजूद यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। कन्याकुमारी और कोयम्बटूर जैसे अपने सीमित पारंपरिक इलाकों से परे भाजपा अब मदुरै सहित अन्य क्षेत्रों में अपने पांव जमा रही है। धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए यह विशेष चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि खासकर यह तब हो रहा है जब भाजपा द्रविड़ पार्टियों में से किसी एक पर भी आश्रित नहीं है। एमके स्टालिन के खिलाफ कुछ उभरती सत्ता-विरोधी लहर के बगैर ऐसा हो पाना संभव नहीं था।
भाजपा के लिए राज्य की दूसरी बड़ी ताकत बनने की बात तो रही दूर, उसे अभी पूरे राज्य में एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में उभरने के लिए एक लंबा सफर तय करना बाकी है। डीएमके की भारी जीत ने पहले ही अन्नाद्रमुक गुटों में एकता के लिए आंतरिक दबाव को बढ़ा दिया है और ऐसे में यदि वे एक साथ आते हैं तो भाजपा के लिए सिर्फ एक सेलेब्रिटी नेता के खास गढ़ के अलावा समूचे राज्य में अन्नाद्रमुक से आगे निकल पाना और भी दुरूह हो जाने वाला है। इसके अलावा, भाजपा की भगवा राजनीति को तमिलनाडु में कहीं अधिक दुर्जेय सांस्कृतिक-राजनीतिक विरासत का सामना करना पड़ रहा है, जिसे वे सिर्फ कुछ उग्र हिंदुत्ववादी बयानबाजी या मीडिया-केंद्रित जुबानी राजनीतिक आक्रामकता से पार कर पाने की उम्मीद न रखें।
पुडुचेरी की एकमात्र सीट पर कांग्रेस विजयी रही है। गोवा की तरह एक वाणिज्यिक शहर एवं पर्यटन शहर जैसी कई समानताएं होने के बावजूद, पुडुचेरी में प्रति व्यक्ति आय की तुलना गोवा के नहीं की जा सकती है। अतीत में, गोवा ने पूरी निर्भयता के साथ महाराष्ट्र के प्रभुत्व को खत्म करने का काम किया था, लेकिन पुडुचेरी ने खुद को तमिलनाडु पर शासन करने वाले हर दल के पिछलग्गू के तौर पर पहचान बना रखी है।स्वतंत्र राज्य के दर्जे पर समय-समय पर कुछ सुगबुगाहट होने के बावजूद, राज्य में मौजूद तमाम राजनीतिक शक्तियों ने पूर्ण राज्य या उससे कम पर और ज्यादा शक्तियों के लिए एक सुसंगत कार्यक्रम के साथ सामने आने का दम नहीं दिखाया है। वहां भी हमें निर्भरता देखने को मिलती है। नतीजतन, पर्यटन के कुप्रभावों, जैसे कि बड़े पैमाने पर वेश्यावृत्ति एवं सांस्कृतिक पतन जैसे मुद्दों से निपटने में यह सक्षम नहीं है। ये मुद्दे चुनाव प्रचार में तो अवश्य उभरे लेकिन निर्णायक रूप से असरकारक नहीं रहे।
उत्तर भारत अब राजनीतिक रूप से अखंड रहने के बजाय विभाजित हो चुका है और भाजपा के पीछे पूरी तरह से एकजुट नहीं है। उत्तर भारत और पश्चिम में मिले झटके से भाजपा दक्षिण में हासिल कुछ प्रगति से थोड़ी राहत महसूस कर सकती है।

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