सिक्के सी बेटियां
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अब तो नोट हो गए बेटे
सिक्के सी रह गईं बेटियां
उनको दिख रही नोटों की धमक
सुनते नहीं हैं सिक्के की खनक।
नोटों के दीवानों सोचो दीगर
सिक्के सी बेटी को समझो अगर
बूंद-बूंद से ही बनता है सागर
नोट बनाती सिक्के की गागर।
विपरीत हवा में नोट उड़ जाएगा
दुःख की बारिश में घुल जाएगा
सिक्का तो भाई वहीं पड़ा रहेगा
तेरे साथ वह हरदम खड़ा रहेगा।
गुल्लक में नोट कम, सिक्के ज्यादा
आबादी में बेटियां कम, बेटे ज्यादा
तूझे अब बेटों में दिख रहा है फायदा
बेटियों को कोख में ही मार रहा ज्यादा।
भैया बिन सिक्कों के कुछ न होगा
सिर्फ और सिर्फ नोटों से क्या होगा
तो सवा रुपये का प्रसाद कैसे चढ़ेगा
गंगा जी की तू अरदास कैसे करेगा।
नोट तो केवल छपती है कागज की
हवा में उड़ती, पानी में घुलती कागज की
सोने का सिक्का, चमक कभी चांदी की
एल्मुनियम का सिक्का, खनक पीतल की।
चल मान लिया तेरे बेटे नोट सही
हमारी बेटियां बस सिक्का ही सही
पर न रहेगी तेरी नोटों की कोई धमक
गर शामिल न हुई मेरे सिक्कों की खनक।
हर सुख-दुःख में नोट से काफी आगे
हर जगह हमेशा सिक्के ही खूब भागे
सिक्के की खनक से सबके सब जागे
नोट पर सिक्का लेकर सब लोग भागे।
अपनी जेब में रखो नोटों जैसे बेटे
आंगन में खनके सिक्के सी बेटियां
दिखे नोटों की अच्छी उजली धमक
सुने सब सिक्कों की भी मीठी खनक।
रचना : नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान, पत्रकार
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