● हाथियों द्वारा फसलों को पहुंचाए जा रहे नुकसान का किसानों को नहीं मिल पा रहा मुआवजा।
● फील्ड डायरेक्टर ने बताया एलीफैंट कॉरिडोर बनने के बाद किसानों को आसानी से मिल सकेगा मुआवजा।
● जंगल के निकटवर्ती लोगों के जीवन की सुरक्षा के लिए वन प्रशासन नहीं कर पा रहा व्यापक इंतजाम।
(धर्मवीर गुप्ता)
बांकेगंज खीरी। बीते कुछ महीनों में मानव और वन्यजीवों के बीच निरंतर संघर्ष बढ़ता जा रहा है। पहले बाघ और तेंदुए इंसानों का शिकार करते रहे अब जंगल से निकलकर हाथी हमलावर हो रहे हैं। मानवों और वन्यजीवों के बीच बढ़ता यह संघर्ष अन्ततः वन्यजीवों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है विगत में इसके उदाहरण देखे जा चुके हैं। सहअस्तित्व बनाये रखने के लिए जागरूकता कार्यक्रम और फसल के मुआवजा की नीति स्पष्ट करने की जरूरत है।
ग्यारह दिसम्बर को मोहम्मदी रेज में हैदराबाद थाना के नयागांव निवासी दो बुजुर्गों को हाथियों ने गंभीर रूप से घायल कर दिया वे कठिना नदी के कर्बला घाट पर मवेशी चराने गए थे। इससे पूर्व शिवपुरी निवासी साठ वर्षीय रामभरोसे को कुचलकर मार डाला था। इससे पूर्व भरिगवां बीट में एक युवक को हाथियों ने घायल कर दिया था। हाथियों के आक्रामक होने से जंगल के निकटवर्ती क्षेत्रों में खेती कर रहे किसान और ग्रामीण परेशान है। पिछले कई वर्षों से हाथी लगातार किसानों की फसलों को रौंद रहे हैं। जीवन यापन के लिए उगाई जा रही फसलों और उनके जीवन की सुरक्षा के लिए वन प्रशासन द्वारा व्यापक इंतजाम न किए जाने, फसलों के नुकसान का मुआवजा न मिल से किसान निराश है। फसलों की सुरक्षा के लिए यदि खेतों में जाएं तो वन्यजीवों द्वारा मारे जाएं और यदि न जाएं तो फसलों के नष्ट होने से भूखे मारे जाएं। इन परिस्थितियों में वन्यजीव और मानव का साथ रहना कठिन होगा। ऐसे में वन्यजीवों को ग्रामीणों द्वारा हानि पहुंचाने के प्रयास किये जा सकते हैं जो वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न कर सकता है।
जब मानव वन्यजीवों से स्वयं के अस्तित्व के लिए खतरा महसूस करता है तो वह वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने लगता है। विगत में इसके कई उदाहरण देखे जा चुके हैं। अभी हाल ही में केरल में जब हाथियों ने किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरू किया तो किसानों ने खेतों में बारूद आग रखना शुरू कर दिया जिससे हाथियों को नुकसान पहुंचा। यद्यपि वन्यजीवों को हानि पहुंचाना पूरी तरह गलत है। इस धरती पर जितना मानवों का अधिकार है उतना ही अधिकार वन्यजीवों और पशु पक्षियों का भी है। बारूद रखने वाले व्यक्ति को उसका दण्ड भी मिला वह आज भी बंद है परन्तु किसानों को खेतों में बारूद रखने की जरूरत क्यों पड़ी इस पर विचार नहीं किया गया।
फसलों के नुकसान का मुआवजा न मिलने के कारण किसान हाथियों को खेतों से दूर रखने के लिए शोर मचाता है। पटाखे दगाते है और मिर्च मिला भूसा सुलगाता हैं। निरंतर हो रही इस प्रक्रिया से हाथियों में भी चिडचिडापन आ जाता है। वे मानवों को अपना शत्रु समझ बैठते हैं और आक्रामक हो जाते हैं। मानव और वन्यजीवों में सहअस्तित्व बनाये रखने के लिए नेपाल में जंगल के निकटवर्ती गांवों में हाथियों के पहुंचने पर सायरन बजाकर जानकारी देने की व्यवस्था की गयी है। फसलों के नुकसान पहुंचाने पर मुआवजा दिया जाता है। इससे किसान भी इन्हें सहजता से स्वीकार कर लेते हैं।
दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व मोहम्मदी और अन्य वन क्षेत्रों को लेकर बनाया जाने वाले एलीफेंट कारीडोर की सफलता के लिए किसानों और ग्रामीणों के मन में भी इन वन्यजीवों के प्रति सकारात्मक भाव होने जरूरी है। इसके लिए इन्हें जागरूक भी करने की जरूरत है और सुरक्षा और सतर्कता के व्यापक इंतजाम किए जाने की भी जरूरत है। फसलों का नुकसान होने पर मुआवजा मिलने के लिए निर्धारित समय सीमा भी आवश्यक है। इनके अभाव में ये ग्रामीण और किसान कहीं वन्यजीवों को अपना शत्रु न मान बैठे।
नेपाल के वन्यजीव विशेषज्ञ आशीष कुमार चौधरी
नेपाल के वन्यजीव विशेषज्ञ आशीष कुमार चौधरी ने बताया कि आमतौर पर हाथी शान्तिप्रिय और बुद्धिमान जीव है। वह किसी पर हमला नहीं करता है परन्तु जिस तरह हम अपने परिवार के साथ चलते समय उसकी सुरक्षा के प्रति चिंतित रहते हैं उसी तरह हाथी भी अपने परिवार के साथ विचरण करते समय अपने परिवार के प्रति चिंतित रहता है। जब आदमी उनके नजदीक जाने लगता है तो वे परिवार के प्रति खतरा महसूस करते हैं। अपने कान, सिर व सूँड़ हिलाकर व्यक्ति को दूर रहने का संकेत देते हैं। उनके इस व्यवहार से अपरिचित आदमी जब उनके नजदीक पहुँच जाता है तो हाथी आक्रामक हो जाते हैं। जंगल के निकटवर्ती किसानों व ग्रामीणों को हाथियों के व्यवहार से परिचित कराने के लिए हमारे यहाँ हाथी मेरा साथी कार्यक्रम चलाया जाता है। साथ ही जंगल के निकटवर्ती गांवों में सायरन लगवाये गये हैं। हाथियों के आने पर सायरन द्वारा ग्रामीणों को सतर्क कर दिया जाता है। किसानों की फसलों को हाथियों द्वारा नष्ट किये जाने पर उन्हें मुआवजा दिया जाता है। मानव और वन्यजीव में सहअस्तित्व बनाये रखने के लिए दोनों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था जरूरी है। आमतौर पर धान की फसल समाप्त होने पर नेपाल से गये हुए हाथी वापस आ जाते थे परन्तु गन्ना उनका प्रिय भोजन हो चुका है जिससे वे अब लम्बे समय तक वहाँ ठहर रहे हैं। गन्ने की फसल समाप्त होने पर वे पुनः वापस आ जायेंगे। अब तो यह भी सुनने में आ रहा है कि जिस मार्ग से गन्ना जाता है हाथी उस मार्ग के किनारे भी डेरा जमा ले रहे हैं।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक ने बताया कि बाघ और तेंदुए द्वारा मौत के मामलों में विभाग पीड़ित परिवार को उत्तर प्रदेश सरकार के आपदा मोचक निधि से एक सप्ताह के अंदर से अनुतोष राशि दिलाता है। जबकि हाथियों द्वारा फसलों का नुकसान किए जाने पर राजस्व विभाग से लेकर वन विभाग तक की रिपोर्ट लगती है। रिपोर्ट वस्तुपरक न होकर स्वआंकलन पर आधारित होती है। इससे नुकसान के सही आकलन में कठिनाई होती है। दूसरे इसके लिए बजट आवंटन में कभी कभी विलम्ब हो जाता है। इसलिए नुकसान के मामलों में राहत राशि मिलने में देर होती है। किशनपुर सेंचुरी पीलीभीत टाइगर रिजर्व, मोहम्मदी व अन्य क्षेत्रों को मिलाकर एलीफेंट कारीडोर बन जाने के बाद विभाग प्रयास करके किसानों को हुए नुकसान की शीघ्र भरपाई की व्यवस्था करेगा। इसके लिए कुछ अंश केंद्र सरकार देगी और कुछ राज्य सरकार। हाथियों के प्रति ग्रामीण जनमानस को जागरूक करने के लिए विभाग गज मित्रों की नियुक्ति की योजना बना रहा है। इसके अलावा नेचर इन्वायरमेंट संस्था के साथ मिलकर विभाग हाथियों और ग्रामीण जनमानस के बीच सह अस्तित्व की भावना बनाए रखने के लिए अन्य प्रयास भी करेगा। जंगल के निकटवर्ती लोगों को भी इसमें सहयोग करना चाहिए हाथियों द्वारा यदि थोड़ा नुकसान पहुंचाया गया है तो उस पर हो हल्ला मचाने की बजाय वास्तविक हानि का ही आकलन कराना चाहिए। तथा जंगल के समीप यदि कहीं शराब बनाई जा रही है तो इसकी सूचना ग्रामीणों को सक्षम अधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए क्योंकि हाथी शराब की सुगंध को दूर पहचान लेते हैं और वे वहाँ जाने का प्रयास करते हैं। इससे अधिक नुकसान का खतरा भी बना रहता है।
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