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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

यूपी / नगर निकाय चुनाव में बिगुल बजाने को दावेदार तैयार, भाजपा भी भीड़

अनिल कुमार श्रीवास्तव। नगर निकाय चुनाव में भले जातीय आरक्षण के अलावा कोई स्थिति न क्लियर हुई हो लेकिन शहरों, कस्बों में चुनावी पर्व का आगाज हो गया है।
चौराहों, गलियों और सार्वजनिक स्थलों पर चमचमाते पोस्टर, गली नुक्कड़ों पर दावेदार समर्थकों की चहल पहल, पान, चाय की दुकानों पर चौपालें और दावेदारों की सक्रियता इस बात के संकेत दे रहे हैं कि इस बार नगर निकाय के चुनाव ऐतिहासिक होने वाले हैं। और इस बार के चुनावों में राजनीतिक दलों का खासा दखल होने वाला है। हालांकि स्थानीय निकाय चुनावों में अब तक व्यक्तित्व खास मायने रखता था लेकिन इस बार पोस्टर्स पर दावेदारों के बैकग्राउंड में राजनीतिक दलों के सिंबल व सम्बंधित दलों के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह साफ हो रहा है कि सियासी दलों का खासा दखल होने वाला है।
उत्तर प्रदेश की ज्यादातर नगर पालिका, नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद की दावेदारी के लिए भाजपा में भीड़ है। और हो भी क्यों न मोदी मैजिक, मोदी-योगी फैक्टर के सहारे केंद्र व प्रदेश में भाजपा पूर्ण बहुमत से काबिज है। साथ ही उत्तरोत्तर बढ़त की ओर है। हर नगर पालिका में आधा दर्जन से लेकर एक दर्जन दावेदार भाजपा से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। बहुत संभव है कि उसमें से कुछ वोट कटवा हों और कुछ मंडवाली करने वाले दावेदार हों। लेकिन इतनी ज्यादा दावेदारी भाजपा के लिए परेशानी का कारक बन रही है, अच्छी बात यह भी है जहां शकर हो वही चींटी जाती है कि तर्ज पर यह भाजपा की लोकप्रियता दर्शाती है। फिलहाल भाजपा के वरिष्ठ दावेदारों की कुंडली खंगालने, जनता के बीच उनकी लोकप्रियता व अन्य आंकलन में लगे होंगे, और जिले के अलावा प्रदेश इकाइयां व आरएसएस भी इनके टिकट पर मोहर लगाने में मुख्य भूमिका अदा कर सकता है। क्या होगा? यह भविष्य के गर्भ में है, अभी तल किसी दल से किसी अधिकृत प्रत्याशी की घोषणा नही की गई है। 
जनाधार के मामले में समाजवादी पार्टी भी पीछे नही है, बेशक वह इस बार विधानसभा चुनाव हारी हो लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी वही है। उसका अपना वोट बैंक है और जनाधार है। टिकट मांगने के मामले में नगर निकाय चुनावों में दुसरे नम्बर पर भीड़ वहीं दिख रही है। हालांकि चुनाव लड़ने वालों की कमी बसपा व कांग्रेस में भी नही है।अभी तक किसी भी दल ने किसी भी प्रत्याशी की घोषणा नही की है। सभासद पर के लिए भी हर वार्ड से प्रत्याशी भाजपा को प्राथमिकता दे रहे हैं। जबकि यह स्थानीय चुनाव हैं और व्यक्तिगत छवि, व्यवहार के आधार पर लड़े जाते रहे हैं। और मुझे लगता भी यही है कि पार्टी का वोट तो है ही लेकिन नेता की छवि व व्यवहार इस चुनाव में बहुत मायने रखने वाला है।
उधर चाय - पान की चौपालों पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। अपने अपने पसंदीदा नेता के समर्थन में डिबेट जारी है। यहां पर दावेदारों की पोल से लेकर उपलब्धियां तक सुनी, समझी जा सकती हैं। चाय की दुकानों पर आने वाले अखबार और उनकी स्थानीय खबरों के आधार पर नित नई कहानियां गढ़ने वाले शिगूफे छोड़ते भी दिख जाएंगे। 
इस चुनाव में सोशल मीडिया भी खासा दखल रखने वाला है, यूं कह लीजिए दावेदारों की दावेदारी का आगाज ही सोशल मीडिया से हुआ। उनके पोस्टर, बैनर तो दीपावली के बाद से मार्किट में आने शुरू हुए थे। सोशल मीडिया के हर मंच पर नेताओ के ग्रुप्स व उन समूहों मेंउपस्थित उनके समर्थक नारेबाजी कर उन्हें उत्साहित व ऊर्जित कर रहे हैं। व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम आदि मंचो पर नेता व उनकी सोशल मीडिया टीम बराबर दावेदारी का बिगुल फूंक रही है और वीडियो, कंटेंट के जरिये लोगो को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। मुझे लगता है इस बार नगर निकाय का आधा चुनाव सोशल मीडिया के मैदान में लड़ा जाएगा। जिसने सोशल मीडिया के फेसबुक व व्हाट्सएप्प मंच अहम भूमिका निभाएंगे। क्षेत्रीय विकास तो लगभग कामन मुद्दा है, इस चुनाव को जातिवाद, गली वाद, व्यक्तित्व व व्यवहार भी प्रभावित करेंगे।

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