● दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता की माँ का नही "राष्ट्र माता" का देहांत।
● प्रधानसेवक ने पुत्र और 'राष्ट्रपुत्र' दोनों का निभाया फर्ज ।
● एक बेटे के रूप में अपना फर्ज निभाने के बाद, वे प्रधानमंत्री के रूप में अपने कर्त्तव्य को नहीं भूले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां हीराबा मोदी का अहमदाबाद के यूएन मेहता अस्पताल में आज 100 साल की उम्र में निधन हो गया। हीराबा मोदी प्रधानमंत्री के छोटे भाई पंकज मोदी के साथ गांधीनगर के पास रायसन गांव में रहती थीं।पीएम मोदी ने कहा, ‘मां में मैंने हमेशा उस त्रिमूर्ति को महसूस किया है, जिसमें एक तपस्वी की यात्रा, एक निस्वार्थ कर्मयोगी का प्रतीक और मूल्यों के प्रति समर्पित जीवन समाहित है।’ प्रधानमंत्री की माताजी के देहावसान की खबर मीडिया में आई थी, लगा कि आज तो उनका पार्थिव शरीर कहीं अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, फिर जैसा अन्य राजनेताओं के परिवार में होता है, उसी परंपरा के अनुसार राजसी तरीके से अंतिम संस्कार होगा। VVIP लोगों का ताँता लगेगा, हो सकता है पुलिस द्वारा फायरिंग कर सलामी भी दी जाए। पूरा अंतिम संस्कार का कार्यक्रम राजनितिक हो जाएगा, मगर ऐसा सोचते-सोचते टेलीविज़न देखा, तो पता चला कि, मोदीजी और उनके भाई पंकज भाई मोदी समेत परिवार के लोग तो माँ के पार्थिव शरीर को बिल्कुल सामान्य तरीके से लेकर श्मशान पंहुच चुके है। ये सब इतने सामान्य तरीके से हुआ, जितना मध्यम या आम लोगों के परिवारों में भी नही देखने को नही मिलता। यह समाज के सामने बहुत बड़ी मिसाल है। नहीं तो आज हम लोग देखते हैं कि एक विधायक या सांसद के परिवार में भी किसी व्यक्ति का निधन होता है, तो वहां भी बड़े धूमधाम से तामझाम से उसे एक इवेंट का रूप दे दिया जाता है और राजनीतिक दिखावेबाजी शुरू हो जाती है। मगर, आज प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखा दिया है कि VIP भी एक आम इंसान है। उसका भी एक परिवार है, जिसे एक शालीनता से परिवार के साथ, घर के किसी भी प्रकार के कार्यक्रम को किया जा सकता है। बिना किसी सियासी ड्रामे के केवल 15-20 घर- परिवार के लोंगो की मौजूदगी में प्रधानमंत्री की माताजी का अंतिम संस्कार देखकर पूरा देश प्रेरणा ले सकता है। और बेटे का फर्ज निभाने के बाद भी प्रधानमंत्री तमाम भावनाओं के ज्वार को अपने ह्रदय में समेटे माँ भारती की सेवा में उपस्थित हो गए। बंगाल के लिए 7800 करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन किया, राज्य की पहली वन्दे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया और यही नहीं, बंगाल न आ पाने के कारण जनता से माफ़ी भी मांगी। भारत की इस पवित्र धरा पर इस प्रकार के कर्तव्यनिष्ठ और जनसेवक विरले ही होते हैं।
मीडिया में आई तस्वीरों को देखकर भरोसा ही नही होता कि विश्व का सबसे लोकप्रिय नेता, अपनी माँ को इतने सामान्य तरीके से, बाँस और घास की अर्थी को कंधा देकर चला जा रहा है, चेहरे पर शोक साफ झलक रहा है, लेकिन कोई राजसी तामझाम नहीं, अंतिम यात्रा ऐसे निकली, जैसे हमारे मोहल्ले या कॉलोनी के किसी व्यक्ति के स्वर्ग सिधारने पर निकलती है। वरना, पीएम मोदी के एक इशारे पर पूरा केंद्रीय कैबिनेट, भाजपा के तमाम विधायक और हज़ारों-लाखों कार्यकर्ता वहां उपस्थित हो सकते थे।
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