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बुधवार, 16 नवंबर 2022

विचारणीय : घटना घटी नही कि कलम चली नही : अमित अम्बष्ठ "आमिली"

श्रद्धा के 36 टुकड़े और उसपर महज दो दिनों में लिखी गयी 3600 कविताएँ  मुझे संवेदनशीलता की जगह संवेदनहीनता लगती है । पता नहीं हम कवि कहलाने की इतनी जल्दी में क्यों हैं ? प्रेम की जिद , लिव इन रिलेशनशिप, लव जेहाद , माता पिता की अवहेलना करने वाली कुसंस्कारी लड़की , गलत इतिहास की पढाई , मार्डन होने का दिखावा , मेरा वाला आफताब  जैसे न जाने ऐसे कितने एंगल से लिखी गयी कविताओं  ने न जाने उसके परिवार वालों और माता पिता को कितना धैर्य / संबल प्रदान किया होगा  या ढाढस बढाया होगा ? यह तो विचारणीय विषय है लेकिन इतना जरूर है कि समाजिक तौर पर भी सिर्फ लिख देने से समस्याएँ हल नहीं होती ,  न एक कविता की रचना आपको संवेदनशील होने का सर्टिफिकेट देती हैं , कई बार ऐसा लगता है कि हम कवि लेखक भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसा भांड हो गए हैं कि ऐसी घटनाओं के इंतजार में होते हैं कि घटना घटी नहीं कि कलम चली नहीं। 

अमित कुमार अम्बष्ट "  आमिली "

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