सनातन संस्कृति का उपहास उड़ाते अपकमिंग मूवी थैंक गॉड में अभिनेता अजय देवगन
एक बार फिर सनातन धर्म पर कुठाराघात कर रहा है फ़िल्म जगत। यह कोई नई बात नही है, अपने उदयकाल से ही यह इंडस्ट्री समय समय पर सनातन धर्म का मजाक बनाती आ रही है। ऐसी फिल्मों की फेहरिस्त तो बड़ी लंबी है किंतु यह विरोध इस समय प्रखर क्यों है?
क्या ऐसे विरोधों को सनातन पुनर्जागरण से जोड़ना उचित है? या यह मात्र एक राजनीतिक मरीचिका है जिसमे आमजन को अपने अच्छे दिन दिखाई देते हैं?
राजनीति की इस चौसर चाल को फ़िल्म उद्योग अपने विकास के लिए इस्तेमाल कर रही है। लेकिन वह यह भूल जाती है कि सनातनी आस्था पर किये गए कुठाराघात ने राजनीति में सुनामी लाकर स्थापित राजनीतिज्ञों को उखाड़ फेंका। फ़िल्म उद्योग अपनी इन चालों के दूरगामी परिणामों से अनभिज्ञ है। दक्षिण भारतीय फिल्मों में भारतीय संस्कृति का रूपांकन सराहनीय रहा है किंतु सस्ती लोकप्रियता के लिए इंड्रस्ट्री ने भी सनातन धर्म को अपना शिकार बनाया है।
हमेशा सनातन धर्म को ही शिकार क्यों बनाया गया? यह एक आत्ममंथन का विषय है।
सनातन कहां कमजोर हैं ? आज का हिन्दू, हिन्दू न होकर ब्राह्मण, कायस्थ, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र तथा सेकुलरों में विभाजित हो गया है। सेकुलर सनातन ही निकला वर्ग है जो किसी अन्य धर्म मे नही पाया जाता है।
फ़िल्म इंड्रस्ट्री यदि किसी अन्य धर्म के ईश्वर का अपमान करती है तो उसका विरोध सिर्फ इस देश मे ही नही बल्कि विश्व मे फैले उनके धर्मावलंबियों द्वारा किया जाता है किंतु हिंदुस्तान में सनातन धर्म के किसी एक वर्ग के ईष्ट देवी देवता का अपमान अन्य वर्गों को अपना अपमान प्रतीत नही होता है। जिससे विरोध की मात्रा कम हो जाती है। और यह कम मात्रा का विरोध अपमान करने वालों की लोकप्रियता में बदल जाता है।
अगर अपनी आस्था के स्रोतों व उनकी मर्यादा की रक्षा करनी है तो सनातन धर्म को एकता के सूत्र में बंधकर विरोध करना होगा, जिससे विरोध प्रखर व मुखर हो। जिससे उन्हें अपनी चौसर चालों का मुंहतोड़ जवाब मिले और वह अपनी सस्ती लोकप्रियता के चक्कर मे सनातनी आस्था से खिलवाड़ न कर सकें।

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