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सोमवार, 19 सितंबर 2022

धैर्य की "शैय्या" पर नेफ्रो. की "नैया"

        ✍️कलमकार अनिल कुमार श्रीवास्तव
प्रदूषित पर्यावरण, दूषित खानपान, अनियमित दिनचर्या और अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव वैसे तो तमाम रोगों के जनक हैं और आंतरिक अंगों को प्रभावित कर उनकी कार्यक्षमता को कम कर देते हैं। किंतु इन कारकों से तेजी से फेल होते गुर्दे चिकित्सा जगत की बहुत बड़ी चुनौती बन कर उभरे हैं। मौजूदा समय में तेजी से बढ़ रहे डायलिसिस मरीज इसका जीता जागता उदाहरण हैं।
हालांकि चिकित्सको के मुताबिक गुर्दा फेल होने के और भी कई कारण होते हैं जैसे रक्त में रक्तचाप, शर्करा की मात्रा बढ़ना, दुर्घटना, अनुवांशिक कारण आदि आदि, लेकिन ज्यादातर डायलिसिस रोगी प्रदूषित पर्यावरण, दूषित खानपान, अनियमित दिनचर्या और अंग्रेजी दवाओं के साइड इफेक्ट्स से भी बढ़ रहे हैं।
दरअसल यह बीमारी इधर पिछले एक दशक से बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है, इस बात को लेकर डाक्टर भी चिंतित हैं। इससे पहले आमजन शायद ही इसके विषय में जानते हों। अत्यधिक विकसित जगहों पर तो इस बीमारी के प्रति लोग जागरूक थे। लेकिन एक से डेढ़ दशक पूर्व गांव, कस्बे में गुर्दा फेल हो जाना बस न्यूज मात्र था। यहां के लोग डायलिसिस प्रक्रिया से अनजान से थे, सुविधा सम्पन्न व शिक्षित लोगो को पता होगा लेकिन आमजन की समझ से बाहर थी डायलिसिस। बीते दशक जब इस बीमारी ने तेजी से पांव पसारने शुरू किए तो विकासशील देश भारत में इससे निपटने के पर्याप्त संसाधन नही थे, हालांकि बीमारी के विकराल रूप को देखते हुए आज भी नही हैं।
वैसे आपको बताते चलें गुर्दा फेल असाध्य रोग है, मेडिकल साइंस में सिकुड़/मर चुके गुर्दे को वापस सही नही किया जा सकता है। डायलिसिस द्वारा मरीजों को स्थिर रखा जा सकता है। और गुर्दा प्रत्यारोपण से मरीज को दवाईयो के सहारे सामान्य बनाए रखा जा सकता है। लेकिन यह भावनाओ का देश है, जिसके परिवार में किसी अपने के गुर्दे फेल हो और अजीवन डायलिसिस से स्थिर रहने की सलाह दी जा रही हो। और उसके पास गुर्दा, धन ( ट्रांसप्लांट खर्च) की व्यवस्था न हो। और ऐसी दशा में कोई नीम हकीम, झाड़ फूंक वाला यह कह दे की वह शर्तिया ठीक कर देगा। फिर अपनों की भावनाओ के आगे विवेक, चेतना शून्य हो ही जाती है। और यहां से शुरू होता है मरीज का दुर्भाग्य। कभी कभी मरीजों को नुस्खे की आजमाइस आईसीयू का मुंह तक दिखा देती है।और कभी कभी मामला गुर्दा रोग विशेषज्ञ के हाथों से निकल चुका होता है। आर्थिक हानि होती है वो अलग। खैर शुरू शुरू में मानता कोई नही है और भावनाओ के सागर में बह कर बीमार व तीमारदार अलग अलग पैथियो केे कथित जानकारों के तिलिस्म में फंसते जरूर हैं। कभी कभी मरीज समझ रहा होता है लेकिन उसके संबंधी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिले ज्ञान के आधार पर इतनी प्रबलता से बात रखते हैं कि मरीज का अनुभव दम तोड देता हैं। वह ज्ञान इतना जोरदार होता है की 3, 4 साल पुराना मैसेज फारवर्ड कर कहते हैं सुधीर कुमार से बात कर लो 2 किडनी उपलब्ध हैं। यहां सुधीर कुमार कथित नाम है। 
वैसे यह असाध्य रोग होता ही बेहद गम्भीर है। एक बार गुर्दा फेल होने पर ट्रांसप्लांट न करवा पाने की दशा में बेहद करीबी ही साथ बचता है। एक एक करके सारे रिश्ते किनारे हो जाते हैं। औपचारिकताएं शेष बचती हैं। उन्ही औपचारिकताओं को निभाते हुए साथ देने वालो की तादात कम ज्ञान देने वालो की तादात अधिक हो जाती है। तमाम चुनौतियों से घिरे मरीज व उसके परिवार को किसी मुसीबत में देख सलाह देने वाले सरकार/प्रशासन के खिलाफ धरने तक सलाह देने लगते हैं। अब उन्हें कौन समझाये कि डायलिसिस शैय्या पर लेटे मरीज के परिजनो का धरना तो उसी दिन शुरू हो जाता है जिस दिन बीमार व्यक्ति पहली बार डायलिसिस शैय्या पर लेटा होता है खास तौर पर उस दशा में जब वह परिवार का मुखिया हो। और वह आजीवन आर्थिक, शारीरिक, मानसिक तीनो चुनौतियों के खिलाफ अपनी पूरी क्षमता से लड़ता है। इन दशाओं में मरीज अपनी जिजीविषा को न छोड़े और परिवार का संबल मिले तो वह अपने हौसलों से इस जंग को आसान बना सकता है।
सकारात्मकता व आत्मविश्वास दो ऐसे शब्द हैं जो हर व्यक्ति को सफलता के शिखर पर पहुंचा सकते हैं। यह बात यहां भी लागू होती है। इन मरीजों को स्थिर बनाये रखने में सफल हो सकती है। इसके अलावा विश्वास बहुत जरूरी है। अपने डॉक्टर व डायलिसिस टीम पर विश्वास। कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि दो या तीन साल डायलिसिस होने के बाद मरीज कुछ अनुभव होने पर अपनी इलाज कर रही टीम से ईलाज को लेकर वाद विवाद पर उतर जाते हैं। और खुद डॉक्टर बनने के चक्कर मे मुसीबत मोल ले लेते हैं। दवाइयां अपने अनुसार खाने/पीने लगते हैं।। कुछ डायलिसिस मरीज मानते हैं डायलिसिस तो होनी ही है तो परहेज क्यों करें।
अपने को स्थिर रखने में सबसे ज्यादा सहायक खुद मरीज ही हो सकते हैं, अगर वह अपनी डायलिसिस टीम पर विश्वास करें और नेफ्रो गाइडलाइंस का पालन करें। लिक्विड कम, पोटेशियम कम,  हाई प्रोटीन डाइट के साथ डाइटीशियन चार्ट को ध्यान में रख परहेज से नियमित खान पान, समय पर दवाई, समय पर डायलिसिस अगर लेते हैं तो तबियत स्थित रखने में काफी हद तक कामयाब हो सकते हैं। इसके अलावा योगगुरु की डायलिसिस आधार सलाह पर योगाभ्यास, नियमित दिनचर्या भी फिट रखने में सहायक हो सकता है। डायलिसिस सपोर्ट पर स्थिर रहने के लिए आवश्यकतानुसार  प्राइमरी मॉनिटरिंग जैसे फीवर, सुगर, बीपी भी जरूरी है।
लगातार फेल हो रहे गुर्दे व इसके बढ़ते मरीज वाकई चिंताजनक हैं। सरकार इससे निपटने के लिए लगातार प्रयास कर रही है जो बढ़ती बीमारी को देखते हुए नाकाफी है। हालांकि इधर कुछ वर्षों से काफी राहत मिली है इन रोगियों को। अगर बात उत्तर प्रदेश की करें तो बीते दशक लखनऊ जैसे गिने चुने महानगरों के गिने चुने अस्पतालों में डायलिसिस की सुविधा हुआ करती थी। जिससे हर मरीज का डायलिसिस करवा पाना मुमकिन नही था आज के समय मे उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सरकार निःशुल्क डायलिसिस सुविधा दे रही है। विडंबना यह है कि सरकार द्वारा हर जिले में न तो नेफ्रोलॉजिस्ट की।नियुक्ति की है और न ही इसकी महंगी दवाएं/इंजेक्शन उपलब्ध करवाए हैं। डायलिसिस के दौरान कम से कम 500 के इंजेक्शन व दवाइया अलग से। अगर मरीज की सप्ताह में तीन डायलिसिस चल रही हैं तो 10 हजार रुपये की दवाइयां, इंजेक्शन वहन करना पड़ता है। कंडीशन सीरियस होने पर उत्तर प्रदेश के हर जिले में डायलिसिस मरीज की स्थिति को नियंन्त्रण में करने वाले आईसीयू भी नही हैं। कहीं कही तो नेफ्रोलॉजिस्ट भी नही हैं।

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