Breaking

सोमवार, 26 सितंबर 2022

आइये जानते हैं क्या होता है समय से न डायलिसिस मिलने पर .....

गुर्दा फेल होने पर इसका कोई स्थायी ईलाज नही है। इसका सिर्फ एक ही इलाज है ट्रांसप्लांट ( गुर्दा प्रत्यारोपण)। आर्थिक रूप से कमजोर मरीज के लिए गुर्दा प्रत्यारोपण सपने के समान है। इसके अलावा गुर्दा फेलियर डायलिसिस प्रक्रिया से खुद को स्थिर रख सकते हैं। जांच के आधार पर गुर्दा रोग विशेषज्ञ तय करते हैं कि सप्ताह में कितनी डायलिसिस करवाने पर मरीज खुद को स्थिर बनाये रख सकते हैं। चिकित्सक कुछ मरीजों को सप्ताह में दो या एक बार की सलाह देते हैं कुछ को पाक्षिक। अति गम्भीर गुर्दा फेलियर को सप्ताह में तीन बार डायलिसिस लेने की सलाह देते हैं।
 कभी कभी कुछ कारणों से मरीज की डायलिसिस नियमित नही हो पाती, जिसका सीधा असर उनके शरीर पर पड़ता है।
मरीज के शरीर मे फ्ल्यूड बढ़ने लगता है जो ह्रदय के लिए बेहद घातक होता है। साथ हो पोटेशियम का लेबल भी बढ़ने लगता। बढ़ा पानी व पोटेशियम हार्ट की कार्यक्षमता कम कर देता है, जिससे ह्रदय सम्बन्धी विकार उतपन्न होते हैं जो कभी कभी ह्रदयाघात कर सकते हैं। दूसरा तो लगभग हर डायलिसिस मरीज को पता होता है यूरिया, क्रेअतिनिन का बढ़ना। रक्त में इनकी मात्रा बढ़ने से चक्कर आने लगते हैं, उल्टियां होती हैं। शरीर बेजान लगने लगता है। सीने में दर्द भी होता है। मसल्स दर्द व खड़े होने की ताकत नही बचती। खतरे का संकेत तो रक्तचाप का स्तर बढ़ने से ही मिलने लगता है। रक्त में सारे तत्व डिसबैलेंस हो जाते हैं तो जांचे भी गड़बड़ा जाती हैं और व्यक्ति भी डिसबैलेंस हो जाता है। 
इसलिए खुद को स्थिर रखने के लिए डायलिसिस रोगी को जांचों के आधार पर चिकित्सक द्वारा दी गयी सलाह को अमल में लाते हुए समय पर डायलिसिस जरूर लेनी चाहिए। बेशक डायलिसिस मरीजों के लिए अपने कम होते हैं मगर जो अपने होते हैं उनके लिए वो खास होते हैं। डायलिसिस मरीज को स्थिर रखने का मूल मंत्र है समय पर डायलिसिस करवाना। बाकी अनुभव जनित मंत्र समय समय पर आप लोगो के सामने पेश करूंगा। तब तक स्वस्थ्य रहें, सुरक्षित रहें व जागरूक बने।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Comments