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रविवार, 25 सितंबर 2022

प्रेरणा प्रवाह : जहां चाह, वहां राह


   एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था, “ कितनी बेकार जगह है ये? बिलकुल भी हरियाली नहीं है…और हो भी कैसे सकती है , यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है।"

           तपती रेत में वह जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था।अंत में वह आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला-

     क्या भगवान ! आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था और तब यह जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती ?

      ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा…मानो वह भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो!

    तभी एक चमत्कार होता है। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उसे सामने एक कुंआ नज़र आता है! *वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था* पर आज तक उसे वहां कोई कुंआ नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंए के पास गया… कुंआ पानी से लाबा-लब भरा था। 

      उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और ईश्वर को पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला*, “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए।”

       उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँए के बगल में पड़ी एक रस्सी और बाल्टी दिख गयी।एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ!

     वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “ लेकिन मैं ये पानी ढो़उंगा कैसे?”

      तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है। उसने पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था!

     अब वह आदमी एकदम से घबड़ा जाता है। उसे लगता है कि कहीं वह रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वह आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है।

      अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि एक पेपर का टुकड़ा उड़ता हुआ उससे आकर चिपक जाता है।

उस टुकड़े पर लिखा था –
मैंने तुम्हे पानी दिया, बाल्टी और रस्सी दी…पानी ढो़ने  का साधन भी दिया।अब तुम्हारे पास वह हर एक चीज है जो तुम्हें रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए। अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है.

      आदमी एक क्षण के लिए ठहरा… पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया.

       मित्रों, कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं…कभी हम सरकार को दोषी ठहराते हैं, कभी अपने बुजुर्गों को, कभी कम्पनी को तो कभी भगवान को पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि एक इंसान होने के नाते हममें ही सारी शक्तियां हैं और हमारी भी कुछ जिम्मेवारी है। 

      किसी भी संस्थान में काम करने के तौर तरीके निर्धारित किये गये हैं। उस संस्था का प्रधान उन नियमों के प्रति उत्तरदायी जरूर होता है पर मातहत माननीयों की भी जिम्मेवारी है कि उन नियमों के अनुसार काम कर वे भी संस्थान के उन्नति में  सहभागी बनें। 

        शुरुआत में भले ही लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान में भी रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं क्योंकि कहा गया है - 'जहां चाह , वहीं राह"। अगर आप किसी चीज को पूरी शिद्दत से चाहते हैं तो पूरी कायनात आपकी चाहत को पूरा करने के अभियान में सहभागी बन जाती है। 

हमेशा याद रखिए कि - Decision makes nothing, determination makes something but dedication makes everything. यानी केवल चाहने या निर्णय लेने से कुछ नहीं होता। अगर आप अपने लिए गये निर्णय पर अडिग हैं तो थोड़ा फर्क पड़ता है पर अगर आप अपने निर्णय को लेकर समर्पित हैं तो बहुत कुछ फर्क पड़ता है । आपका यह समर्पण असंभव को भी संभव बना सकता है पर समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते हैं… अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं!
     तो चलिए, आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडे़ं और अपनी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सबकुछ हमारे हाथ में है!

लेखक : शिवनाथ बिहारी 

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