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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

मुनीर खान की ‘बिना खून’ ग्लूकोज जांच तकनीक को ब्रिटेन में डिजाइन पंजीकरण

उंगली का दर्द मिटाने की दिशा में लखीमपुर के लाल की बड़ी छलांग : मुनीर खान की ‘बिना खून’ ग्लूकोज जांच तकनीक को ब्रिटेन में डिजाइन पंजीकरण

लखीमपुर खीरी। दुनिया भर में करोड़ों मधुमेह रोगियों की हर सुबह और हर जांच के साथ एक छोटी-सी सुई जुड़ी होती है उंगली में चुभन, खून की एक बूंद और फिर ग्लूकोज मीटर पर टिकी निगाहें। वर्षों से चला आ रहा यह दर्द शायद भविष्य में इतिहास बन सके। इसी उम्मीद को तकनीक के पंख देने का प्रयास किया है लखीमपुर खीरी के युवा वैज्ञानिक मुनीर खान ने।

लखीमपुर की मिट्टी से निकलकर वैश्विक विज्ञान जगत तक अपनी पहचान बनाने वाले मुनीर खान ने फोटोनिक सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संयोजन से मधुमेह निगरानी के लिए एक ऐसे उपकरण का डिजाइन विकसित किया है, जिसका उद्देश्य बिना सुई और बिना खून निकाले ग्लूकोज स्तर का अनुमान लगाना है। 

इस उपकरण का डिजाइन ब्रिटेन के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस में पंजीकृत किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार डिजाइन संख्या 6545242 के तहत 20 अगस्त 2026 को प्रमाणपत्र जारी किया गया। इसका नाम “Non-invasive Photonic Medical Device for Diabetes Monitoring” दर्ज है। इस नवाचार में मुनीर खान के साथ मृदुल पांडेय सह-आविष्कारक के रूप में जुड़े हैं। इस तकनीक की परिकल्पना बेहद आधुनिक और रोचक है। उपकरण को त्वचा के संपर्क में, विशेष रूप से कलाई पर रखा जा सकता है। इसके फोटोनिक सेंसर शरीर के ऊतकों की ओर प्रकाश संकेत भेजते हैं और वापस आने वाले संकेतों को ग्रहण करते हैं।

 इसके बाद AI आधारित विश्लेषण प्रणाली इन संकेतों का अध्ययन कर ग्लूकोज स्तर का अनुमान तैयार करने की दिशा में काम करती है। अर्थात न उंगली में चुभन, न खून की बूंद; तकनीक और प्रकाश के सहारे मधुमेह निगरानी का एक नया सपना। छोटे और पोर्टेबल स्वरूप में तैयार किए जा रहे इस तरह के उपकरण भविष्य में मरीजों के लिए निरंतर और सुविधाजनक निगरानी का नया विकल्प बन सकते हैं। Non-invasive glucose monitoring चिकित्सा विज्ञान और तकनीकी जगत की लंबे समय से सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल रही है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस दिशा में शोधरत हैं। फोटोनिक्स, नियर-इन्फ्रारेड तकनीक और मशीन लर्निंग के माध्यम से शरीर के भीतर ग्लूकोज संबंधी संकेतों का विश्लेषण करने पर लगातार काम हो रहा है। मुनीर खान और उनकी टीम का यह प्रयास इसी वैश्विक वैज्ञानिक चुनौती के बीच भारत की प्रतिभा और लखीमपुर की मिट्टी की वैज्ञानिक चेतना को एक नई पहचान देता है। मुनीर खान आज वैश्विक तकनीकी और स्वास्थ्य नवाचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वह वर्तमान में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े हैं और अमेरिका में कैडर टेक लैब्स के संस्थापक के रूप में AI आधारित पहनने योग्य स्वास्थ्य तकनीक पर कार्य कर रहे हैं। उनकी उपलब्धियों की सूची भी प्रेरणा से भरी है। भारत में उन्हें दो बार युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जबकि न्यूयॉर्क में Engineering for Humanity Award से भी सम्मान मिला है। उम्मीद बड़ी है, मगर अभी बाकी हैं कई पड़ाव यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना भी जरूरी है कि ब्रिटेन में हुआ डिजाइन पंजीकरण अपने आप में चिकित्सकीय उपयोग की मंजूरी नहीं है। किसी भी चिकित्सा उपकरण को आम मरीजों तक पहुंचने से पहले व्यापक सटीकता परीक्षण, क्लीनिकल मूल्यांकन और संबंधित नियामक संस्थाओं की स्वीकृति जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। टीम के अनुसार, उपकरण को भविष्य में बाजार तक पहुंचाने के लिए आवश्यक नियामक प्रक्रियाओं की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें अमेरिकी FDA से संबंधित प्रक्रिया भी शामिल है। 

विज्ञान की सबसे सुंदर बात यही है कि वह किसी बड़े शहर या बड़ी प्रयोगशाला की मोहताज नहीं होती। कभी-कभी एक छोटे शहर की मिट्टी में जन्मा विचार पूरी दुनिया के दर्द को कम करने की क्षमता लेकर आगे बढ़ता है। लखीमपुर खीरी के मुनीर खान का यह प्रयास केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों से बड़े सपने देखते हैं। जिस उंगली से दुनिया रोज दर्द की एक बूंद निकालती रही, संभव है भविष्य में उसी दुनिया को प्रकाश की किरणें राहत का नया रास्ता दिखाएं। और उस रोशनी की कहानी में लखीमपुर खीरी के एक बेटे का नाम भी दर्ज हो मुनीर खान।

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