Breaking

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

सीतापुर : राजागांव के पुस्तकालय पर उठे सवाल, जवाब तो आया… पर क्या बदलेगी तस्वीर?

⚪⚫ राजागांव के पुस्तकालय पर उठे सवाल, जवाब तो आया… पर क्या बदलेगी तस्वीर?

सीतापुर. सीतापुर के राजागांव में स्थित पुस्तकालय की वस्तुस्थिति को लेकर जब समाजसेवी विवेक श्रीवास्तव ने सवाल उठाए, तो स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और जाँच कर लिखित जवाब भी सौंप दिया। 

कागज़ों पर जवाब दर्ज हो गया, लेकिन असली प्रश्न अब भी हवा में तैर रहा है, क्या पुस्तकालय वास्तव में ज्ञान का मंदिर बन पाया है, या केवल औपचारिकताओं का केंद्र बनकर रह गया है? पुस्तकालय केवल चार दीवारों में रखी अलमारियों का नाम नहीं होता, यह समाज की चेतना, विद्यार्थियों के सपनों और युवा पीढ़ी के भविष्य का आधार होता है। महान पुस्तकालय विज्ञानी डॉ. एस.आर. रंगनाथन ने वर्षों पहले स्पष्ट कर दिया था कि पुस्तकें उपयोग के लिए हैं, हर पाठक को उसकी पुस्तक मिले, हर पुस्तक को उसका पाठक मिले, पाठक का समय बचे और पुस्तकालय निरंतर बढ़ने वाली संस्था हो। यदि किसी पुस्तकालय में पर्याप्त स्थान न हो, बैठने की व्यवस्था न हो, रोशनी और वेंटिलेशन का अभाव हो, डिजिटल सुविधाएँ न हों, प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष न हो, तो वह भवन तो हो सकता है, पर पुस्तकालय नहीं। एक आदर्श पुस्तकालय में पुस्तकों के साथ पत्रिकाएँ, समाचार पत्र, ई-पुस्तकें, इंटरनेट, स्कैनिंग, प्रिंटिंग जैसी सुविधाएँ भी होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी समय के साथ कदम मिला सकें।

 राजागांव का यह मुद्दा केवल एक गाँव का नहीं, बल्कि उन तमाम स्थानों का प्रतीक है जहाँ शिक्षा के मंदिर उपेक्षा की धूल में दबे पड़े हैं। प्रशासन ने जवाब दे दिया, अब समय है कि जवाबदेही भी दिखे। समाज की सच्ची प्रगति तब होगी, जब गाँव-गाँव का पुस्तकालय रोशन होगा, जब हर बच्चे के हाथ में किताब होगी, और जब ज्ञान के दरवाज़े सचमुच सबके लिए खुलेंगे।

हालांकि सजग नागरिक विवेक श्रीवास्तव द्वारा प्रशासन द्वारा मांगी गयी पुस्तकालय संबंधी जानकारी का जवाब तो ग्राम पंचायत अधिकारी एवं खंड विकास अधिकारी द्वारा चित्र संलग्न करते हुए तो दें दिया गया है. लेकिन इस प्रतिस्पर्धात्मक आधुनिक युग में एक आदर्श पुस्तकालय महज 50 पुस्तकों, 12 कुर्सियों, 4 मैजों से कैसे चल रहा होगा यह विचारणीय सवाल है.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Comments