Breaking

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

महाशिवरात्रि विशेष : ‘शिव’, सामान्य से विराट की ओर...

‘शिव’, सामान्य से विराट की ओर...


लेखिका : सपना अनुश्री

जब मनुष्य सीमाओं से घिर जाता है, जब जीवन का कोलाहल आत्मा की शांति को ढँक देता है, तब भीतर कहीं एक मौन पुकार उठती है “शिव!” यह केवल एक नाम नहीं, यह चेतना का वह विस्तार है जो सामान्य से विराट की ओर ले जाता है।
शिव, जिनके नाम में ही असीम शांति का स्पंदन है। वे न आरंभ हैं, न अंत; वे एक ऐसी उपस्थिति हैं जो हर रूप में, हर प्राणी में, हर श्वास में व्याप्त है। वे करुणा के सागर हैं जहाँ भेदभाव का कोई स्थान नहीं। देव हो या असुर, साधारण मानव हो या असाधारण जीवात्मा जो भी उनकी शरण में आया, वे उसे अपनाने में विलंब नहीं करते। यही उनकी सहजता है, यही उनका महादेवत्व है। शिव और शक्ति ये दो नहीं, एक ही ऊर्जा के दो आयाम हैं। शिव बिना शक्ति के निश्चल हैं, और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन। जब दोनों का संगम होता है, तभी सृष्टि का संतुलन संभव होता है। शिव का मौन और शक्ति का स्पंदन मिलकर जीवन का संगीत रचते हैं। उनका वेश साधारण मृगछाल, जटाओं में बहती गंगा, मस्तक पर शीतल चंद्रमा, गले में सर्प। जो संसार के लिए भय का कारण हैं, वे शिव के लिए अलंकार हैं। जो पदार्थ सामान्य मनुष्य के लिए वर्जित हैं भांग, धतूरा, बेलपत्र वे उनके प्रिय हैं। वे सिखाते हैं कि जीवन के कड़वे, कसैले और तिक्त अनुभव भी साधना का अमृत बन सकते हैं। जब समुद्र-मंथन से हलाहल विष निकला और समस्त सृष्टि भयभीत हो उठी, तब शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। वे जानते थे यह विष विनाशकारी है। परंतु स्वयं को जलाकर भी उन्होंने जगत को बचाया। उनकी अर्धांगिनी शक्ति पार्वती ने उस विष को हृदय तक उतरने नहीं दिया। यही शिव-शक्ति का संतुलन है त्याग और संरक्षण का अद्भुत संगम। तभी तो वे ‘नीलकंठ’ कहलाए, और देवों के देव महादेव बने। योग की परंपरा में शिव आदियोगी हैं। उन्होंने हठयोग का मार्ग दिखाया आत्मनियंत्रण, तप और अडिग साधना का पथ। उनके और पार्वती के संवाद में अध्यात्म का गहनतम रहस्य समाहित है। विज्ञान भैरव तंत्र में चेतना के विस्तार की विधियाँ हैं श्वास-प्रश्वास, कुंभक, समभाव और ध्यान की सूक्ष्म साधनाएँ। यह केवल ग्रंथ नहीं, आत्मा का संवाद है प्रश्न और उत्तर का, साधक और साध्य का। शिव जितने वैरागी हैं, उतने ही पूर्ण गृहस्थ भी। पार्वती ने उन्हें पाने के लिए वर्षों तप किया और ‘अपर्णा’ कहलायीं। यह प्रेम का वह स्वरूप है जिसमें अहं नहीं, केवल समर्पण है। वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं ‘आशुतोष’ हैं पर उनके रौद्र रूप से भी संसार परिचित है। उनके रुद्र अवतारों में हनुमान और भैरव की गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। जब सती ने यज्ञकुंड में देह त्यागी, तब शिव का विलाप यह दर्शाता है कि वे केवल देव नहीं, संवेदनशील हृदय भी हैं।
वे नटराज हैं सृष्टि के लय और ताल के स्वामी। डमरु की ध्वनि से व्याकरण के सूत्र प्रकट होते हैं, और तांडव से सृष्टि का चक्र गतिमान रहता है। उन्होंने गणेश के मस्तक पर गजमुख स्थापित कर सृष्टि की प्रथम शल्य-चिकित्सा का उदाहरण दिया। त्रिशूल उनके हाथ में केवल अस्त्र नहीं जीवन के तीन आयामों (सृजन, संरक्षण, संहार) का प्रतीक है। शिव का जन्म अज्ञात है वे अनादि हैं। परंतु उनका संदेश अत्यंत स्पष्ट है “भीतर मुड़ो।” शिव हमें सिखाते हैं कि हिमालय की कठिन परिस्थितियों में भी साधना संभव है, यदि मन दृढ़ हो। यदि हम राग-द्वेष से ऊपर उठ जाएँ, अपने कर्म में कल्याण को लक्ष्य बना लें, और निरंतर आत्मसाधना करते रहें तो हम भी शिवत्व की ओर अग्रसर हो सकते हैं। शिव कोई दूरस्थ देवता नहीं; वे हमारे भीतर की संभावनाओं का विराट रूप हैं। जब हम अपने भीतर के विष को धारण कर उसे अमृत में बदलना सीख लेते हैं, जब हम द्वैत से ऊपर उठकर अद्वैत का अनुभव करते हैं तभी हम शिवमय हो जाते हैं।
आइए, हम अपने जीवन में शिव को केवल पूजें नहीं, जिएँ। उनकी करुणा, उनका वैराग्य, उनका संतुलन और उनकी साधना इन सबको अपना आदर्श बनाएं। शिव सभी जीवों के लिए कल्याणकारी रहें तथास्तु। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Comments