🔘 AI कैसे बदल सकता है भारत के किसानों की तकदीर?
लेखिका : रुबल चिब, सह-संस्थापक, क्यूज़ेंस लैब्स
भारत में अब एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चर्चा सिर्फ नई तकनीक के रूप में नहीं हो रही है। ध्यान इस बात पर जा रहा है कि एआई आम लोगों की असली समस्याएँ कैसे हल कर सकता है। खेती और खाद्य क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, क्योंकि यहाँ समस्याएँ छोटी नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था से जुड़ी हैं। यहाँ कोई भी तकनीक तभी सफल होगी जब वह मौसम, ढुलाई और बाज़ार जैसी स्थानीय परिस्थितियों को समझे।
भारत इतना भोजन पैदा करता है कि पूरी आबादी का पेट भर सके, फिर भी हर साल करीब 6.8 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। कटाई के बाद 35 से 40 प्रतिशत फल और सब्जियाँ खराब हो जाती हैं। यह समस्या उत्पादन की कमी की नहीं, बल्कि सही समय पर सही जानकारी और बेहतर व्यवस्था न होने की है। यानी खेत से बाज़ार तक तालमेल की कमी है और फैसले समय पर नहीं हो पाते। ऐसे में भारतीय परिस्थितियों के अनुसार बनाया गया एआई इस नुकसान को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
क्यूज़ेंस लैब्स में हमने इस बात पर गौर किया कि भारत की डिजिटल व्यवस्था ने भुगतान, पहचान और सेवाओं को बदल दिया है, लेकिन खाने के क्षेत्र में गुणवत्ता की जाँच अब भी पुराने तरीकों से होती है। इसी सोच के साथ हमने QScan नाम की एआई तकनीक विकसित की, जो इन्फ्रारेड तकनीक और कृत्रिम सूंघने की मदद से फल-सब्जियों की अंदर की गुणवत्ता पहचानकर तुरंत काम आने वाली जानकारी देती है। उदाहरण के तौर पर कोई फल या सब्जी कितने दिन तक चल सकती है कितने दिन स्टोर कर सकते हैं इत्यादि। इसका मकसद कम मुनाफे पर काम करने वाले किसानों, दुकानदारों और ग्राहकों की उलझन कम करना है।
अनुभव बताते हैं कि एआई तभी सफल होगा जब वह भारत की वास्तविक परिस्थितियों को समझे। विदेशों के डेटा पर बने मॉडल भारत जैसे विविध देश में अक्सर सही काम नहीं करते, क्योंकि हर क्षेत्र में फसल, मौसम, भंडारण और बाज़ार अलग हैं। अगर एआई भारतीय हालात को नहीं समझेगा, तो वह बेकार साबित हो सकता है या गलत नतीजे भी दे सकता है। इसी कारण स्वदेशी एआई पर जोर देना समय की जरूरत है। सरकार की IndiaAI Mission पहल दिखाती है कि अब एआई को सिर्फ उन्नत तकनीक नहीं, बल्कि देश के विकास का जरूरी साधन माना जा रहा है। भारतीय डेटा, देश में बने समाधान और अलग-अलग क्षेत्रों के लिए खास तकनीक को बढ़ावा देकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ नवाचार सीधे लोगों की जरूरतों से जुड़ा हो।
खाद्य और खेती का क्षेत्र बताता है कि यह क्यों जरूरी है। अगर कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम हो जाए, तो किसानों की आय बढ़ेगी, खाने की कीमतें स्थिर रहेंगी और पानी, जमीन और ऊर्जा की बचत होगी। इससे पर्यावरण को भी फायदा मिलेगा और पूरी व्यवस्था ज्यादा मजबूत बनेगी। एक और जरूरी पहलू है सबकी भागीदारी। एआई ऐसा होना चाहिए जो छोटे किसानों, स्थानीय भाषाओं और छोटे बाज़ारों में भी आसानी से काम कर सके। जो तकनीक लोगों पर फैसले थोपेगी, उस पर भरोसा नहीं बनेगा। लेकिन जो तकनीक छिपी जानकारी को आसान तरीके से सामने लाकर बेहतर फैसले लेने में मदद करेगी, वही लंबे समय तक टिकेगी और फैल सकेगी।
16 से 20 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में होने वाला India AI Impact Summit ऐसे समय पर हो रहा है जब दुनिया एआई के असर पर गंभीर चर्चा कर रही है। भारत के पास मौका है कि वह ऐसा रास्ता दिखाए जहाँ एआई आम लोगों के काम आए, स्थानीय जरूरतों को समझे और असली आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हो। खेती, खाद्य आपूर्ति और जलवायु से जुड़ी चुनौतियाँ इस दिशा के केंद्र में हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि एआई अपने-आप बदलाव नहीं लाता। इसके लिए सही समझ, सही नीति और मिलकर काम करना पड़ता है। लेकिन जब इसे सही तरीके से अपनाया जाता है, तो यह बिना शोर किए बड़े बदलाव ला सकता है।
इम्पैक्ट समिट के मद्देनजर असली चुनौती एआई को तेजी से अपनाने की नहीं, बल्कि सोच-समझकर सही जगह इस्तेमाल करने की है। आख़िर में सफलता का असली पैमाना यही होना चाहिए कि क्या एआई से भोजन की बर्बादी कम होती है, क्या किसानों की आय बढ़ती है और क्या देश की व्यवस्था मजबूत होती है।
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