🔘 युद्धकालीन ब्लैकआउट : जब अँधेरा करता है जीवन की रक्षा
युद्ध केवल रणभूमि पर लड़ी जाने वाली तलवारों और गोलियों की कथा नहीं है, वह नागरिक जीवन की नाड़ी तक उतर आने वाला भय, सतर्कता और संकल्प का यथार्थ भी है। ऐसे ही समय में जन्म लेता है युद्धकालीन ब्लैकआउट, एक ऐसा मौन अनुशासन, जिसमें रोशनी को बुझा देना जीवन को बचाने का सबसे उजला उपाय बन जाता है।
युद्धकालीन ब्लैकआउट का अर्थ है युद्ध या हवाई हमले की आशंका के समय शहरों, कस्बों और गाँवों में रात के समय समस्त कृत्रिम प्रकाश को पूर्णतः या नियंत्रित रूप से बंद कर देना। इसका उद्देश्य शत्रु विमानों को लक्ष्य पहचानने से रोकना, बमबारी की सटीकता को विफल करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। अँधेरा यहाँ भय का नहीं, बल्कि विवेक और सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। इस व्यवस्था का व्यवस्थित आरंभ द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के दौरान हुआ। जर्मनी द्वारा ब्रिटेन और यूरोपीय नगरों पर किए जा रहे हवाई हमलों के बीच लंदन, पेरिस सहित अनेक शहरों में रात होते ही खिड़कियाँ काली कर दी जाती थीं, स्ट्रीट लाइटें बुझा दी जाती थीं और वाहनों की हेडलाइट तक ढँक दी जाती थीं। नागरिकों को आदेश था एक भी रोशनी बाहर न झलके, क्योंकि एक छोटी सी चमक भी आसमान में मंडराते मृत्यु-दूतों को रास्ता दिखा सकती थी। युद्धकालीन ब्लैकआउट केवल प्रशासनिक आदेश नहीं था, वह नागरिक अनुशासन का सामूहिक अभ्यास था। माताएँ बच्चों को अँधेरे में सुलाती थीं, दुकानदार समय से पहले शटर गिरा देते थे, और शहर एक अदृश्य संकल्प में डूब जाता था हम अपनी सुरक्षा के लिए अँधेरा स्वीकार करेंगे। इस अँधेरे में डर भी था, पर उससे कहीं अधिक देश और जीवन को बचाने की दृढ़ इच्छाशक्ति थी। समय बदला, तकनीक बदली, पर युद्धकालीन ब्लैकआउट का सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक युद्धों में भी, सीमावर्ती क्षेत्रों में या आपात स्थितियों में, प्रकाश नियंत्रण को सामरिक रणनीति के रूप में अपनाया जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी उजाले को छोड़ देना ही सबसे बड़ा उजाला होता है। युद्धकालीन ब्लैकआउट दरअसल एक मौन संदेश है जब राष्ट्र संकट में हो, तब व्यक्तिगत सुविधा से बड़ा होता है सामूहिक सुरक्षा का धर्म। यह अँधेरा नहीं, बल्कि जागरूकता की वह लौ है, जो बिना जले भी जीवन को रोशन रखती है।
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