- अनूप सिंह, संरक्षक, दैनिक जनजागरण की कलम से…✍️
6 सितंबर 2025 को अमरोहा में बच्चों की तस्करी का जो मामला सामने आया, उसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। लखीमपुर खीरी और बहराइच के चार नाबालिग बच्चों को महज़ ₹7,500 प्रति माह की मजदूरी पर बेच दिया गया था। यह सौदा मानो मासूम जिंदगी की कीमत लगाकर कर दिया गया हो। पुलिस और बाल संरक्षण एजेंसियों की तत्परता से बच्चों को छुड़ाया गया, लेकिन यह घटना केवल एक खुला हुआ मामला है, जबकि ऐसे अनगिनत बच्चे अब भी ग़ायब हैं और हमारे समाज की आँखों से ओझल हैं।
भारत में बच्चों की तस्करी और बाल श्रम का संकट नया नहीं है। सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि 2018–19 के प्लोफ्स सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में लगभग 50 लाख से लेकर 1.3 करोड़ तक बच्चे (5–17 वर्ष की उम्र के) बाल श्रम में फँसे हुए हैं। इनमें अधिकतर बच्चे खेतों, घरेलू कामों और छोटे उद्योगों में झोंक दिए जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2022 में ही 2,250 मामले दर्ज हुए और 6,036 बाल पीड़ित सामने आए। इनमें से 6,693 बच्चों को बचाया गया, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असल आँकड़ा इससे कहीं बड़ा है।
रेलवे प्लेटफॉर्म भी बच्चों की तस्करी का बड़ा अड्डा बने हुए हैं। 2023 की रिपोर्ट में बताया गया कि केवल रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने ही 858 बच्चों को प्लेटफॉर्मों से बचाया। दिल्ली जैसे महानगरों में तो स्थिति और गंभीर है। 2025 में दिल्ली में बाल मजदूरी बचाव अभियानों में 51% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, और इनमें से अधिकांश बच्चे उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे गरीब राज्यों से लाए गए थे।
इसी तरह Just Rights for Children (JRC) और C-LAB की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार अब तक 53,651 बच्चों को देशभर में बचाया गया है, जिनमें से 90% को बेहद अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया था। इस रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि 2,971 बच्चों को यौन शोषण से बचाया गया। मध्य रेलवे क्षेत्र में 2020 से 2025 तक RPF ने 1,113 व्यक्तियों (जिनमें बड़ी संख्या में नाबालिग शामिल थे) को बचाया और 347 तस्करों को गिरफ्तार किया।
ये आँकड़े केवल भारत की कहानी नहीं कहते। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर साल लगभग 8 लाख महिलाएँ और बच्चे सीमापार तस्करी का शिकार होते हैं और इनमें से लगभग 80% को यौन शोषण के लिए धकेला जाता है। Walk Free Foundation की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में ही लगभग 1.1 करोड़ लोग आधुनिक दासता (Modern Slavery) की गिरफ्त में हैं, जिनमें लाखों बच्चे भी शामिल हैं।
कई पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता यह भी उजागर कर चुके हैं कि राजस्थान की सिलिका खदानों से लेकर दिल्ली की झुग्गियों और ईंट-भट्टों तक छोटे-छोटे बच्चे श्रम की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। आठ साल का सोनू हो या दस साल की गुड़िया—ये सब हमें आईने की तरह दिखाते हैं कि गरीबी और अपराध मिलकर कैसे बचपन छीन लेते हैं।
सकारात्मक पक्ष यह है कि कई संगठन इस अंधेरे के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। कैलाश सत्यार्थी की संस्था बचपन बचाओ आंदोलन (BBA) अब तक लगभग 1 लाख बच्चों को तस्करी और बाल श्रम से मुक्त करा चुकी है। वहीं, राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (NCLP) योजना के तहत सरकार ने 12 लाख से अधिक बच्चों को बचाकर विशेष स्कूलों और पुनर्वास केंद्रों में भेजा है, हालांकि फंड और संसाधनों की कमी इसके सामने बड़ी चुनौती है।
कानून भी मौजूद हैं—जैसे बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986, और लंबित मानव तस्करी विधेयक, 2021। पर कानून तभी असरदार होंगे जब समाज खुद जागरूक होगा। गाँव और कस्बों में हर नागरिक को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि कोई भी बच्चा अचानक ग़ायब हो या पढ़ाई छोड़कर संदिग्ध “नौकरी” पर भेजा जाए, तो तुरंत सूचना दी जाए। चाइल्डलाइन (1098), पुलिस और बाल कल्याण समितियाँ इसी के लिए बनी हैं।
निष्कर्ष यही है कि अमरोहा की यह घटना केवल पुलिस केस नहीं है, बल्कि हमारे लिए चेतावनी की घंटी है। हर बच्चा हमारा सामूहिक उत्तरदायित्व है। समाज यदि सोता रहा तो ऐसे रैकेट और बढ़ेंगे, पर यदि हम जागरूक होकर हर गाँव, हर मोहल्ले में सतर्क निगाह रखेंगे, तो अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।
जब समाज जागता है, तब अपराध हारता है—और मासूमियत की रक्षा ही समाज की असली जीत होती है।
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