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शनिवार, 16 अगस्त 2025

जंग ए आज़ादी का सिपाही मौलवी लियाक़त अली, जो मौत से भी बड़ा था, जिसको भुला देना हमारा सबसे बड़ा गुनाह

जंग ए आज़ादी का सिपाही मौलवी लियाक़त अली, जो मौत से भी बड़ा था, जिसको भुला देना हमारा सबसे बड़ा गुनाह

कौशांबी ज़िले की चायल तहसील के महगांव गाँव की मिट्टी में आज भी इतिहास की वो खुशबू दबी है, जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दी थी। यहीं जन्म हुआ था मौलवी लियाक़त अली का- 1857 की जंग-ए-आज़ादी के उस बहादुर सिपाही का, जिसने अपने लहू से आज़ादी की पहली इबारत लिखी।1857 में जब पूरे हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों के खिलाफ बिगुल बजा, तो मौलवी लियाक़त अली ने इलाहाबाद के खुसरोबाग़ में अंग्रेजी शासन के समांतर अपनी हुकूमत कायम कर दी। उनके नाम से अंग्रेज़ी फौज खौफ खाती थी। तोपों की गड़गड़ाहट और तलवारों की चमक के बीच, उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ाई लड़ी। अंग्रेज़ी हुकूमत को झुकाने का सपना उन्होंने देखा ही नहीं, बल्कि जीते जी उसे हिलाकर रख दिया। खुसरोबाग उस समय उनकी लड़ाई का गढ़ बना, जहाँ से उन्होंने जनता को संगठित किया और आज़ादी की पुकार को और बुलंद किया।लेकिन अफसोस आज वही वीर सपूत अपनी ही धरती पर भुला दिया गया है। न कोई स्मारक, न कोई चौक, न कोई शिला, जो उनके बलिदान की कहानी सुनाए।समय की धूल में उनका नाम ऐसे दब गया है जैसे कभी था ही नहीं। लेकिन उनकी कुर्बानियों से मिली आज़ादी का आनंद रोज़ लेते हैं। मौलवी लियाक़त अली का नाम फिर से ज़िंदा होना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि कौशांबी की मिट्टी में कभी ऐसा भी सपूत पैदा हुआ था, जो मौत से भी बड़ा था, और जिसे भुला देना सबसे बड़ा गुनाह है।

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