माता पिता के प्रेम का मोल वृद्धावस्था में उन्हें प्रेम देकर तथा उनकी सेवा करके ही चुकाया जा सकता है अन्यथा और किसी तरह से नहीं। माँ अपने नन्हें बच्चे की देखभाल में पूरी रात जागकर बिता देती है। बच्चा रात को जब बिस्तर पर पेशाब कर देता है उसे सूखे बिस्तर की ओर सुलाकर खुद गीले बिस्तर पर सो जाती है। बच्चे की हर गलती को माफ कर देती है। अपने बच्चे को खिलाए बिना भोजन तक नहीं करती है ।ममता देखिए कि बच्चे को भोजन कराने के सैकड़ों तरीके भी जानती है। माँ का प्यार और पिता की छत्रछाया की अहमियत तो अनाथ ही जान सकता है।पिता अपनी क्षमतानुसार बच्चे की इच्छा का पूर्तिकर्ता होता है। माँ और पिता दोनों बच्चे की खुशी में अपनी खुशी समझते हैं। हम उनकी खुशी में अपनी खुशी कब ढूढ़ना शुरू करेंगे? इन सब बातों को देखा जाय तो अपने बुजुर्ग माता-पिता को सम्मान देना और सेवा करना हमारा धर्म है। अक्सर मैंने देखा है कि बड़े होने के बाद पुत्र या पुत्री को माता-पिता से बात करना मुश्किल हो जाता है। यह स्थिति माता पिता को चिन्तित कर देती है।
एक बार अंतिम सांसे गिन रहे पिता से उसके पुत्र ने पूछा," पिताजी, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं ?" पिता ने कहा बेटा मुझे थोड़ा समय दे दिया करो। पुत्र ने जवाब दिया ," पिताजी इसे छोड़कर सब कुछ मांग लीजिए।" इसका कारण था कि पुत्र एक नामी वकील था। अधिक धन कमाने की चाह थी जो स्वभावतः सभी मे होती है इसलिए बड़े शहर में रहकर वकालत किया करते थे। पिता से बात करने तक के लिए भी उनके पास समय नहीं था। पुत्र के जन्म के समय पिता ने कितने सपने सजोये होंगे? कितनी खुशियां मनाई होंगी? क्या इस तरह एकाकी जीवन जीने के लिए पाल पोस कर बड़ा किया, पढ़ाया लिखाया। यद्यपि कि सुबह शाम नौकर आता था जो सफाई कर जाता था। भोजन बनाने खिलाने के लिए अलग नौकर था।
एक बार मैं अपने एक मित्र के साथ एक व्यक्ति के यहां मिलने गया। वह बीमार था। बीमार व्यक्ति बहुत वृद्ध था। वह चारपाई पर पड़ा हुआ था।उनके पास पानी का गिलास रखा था। खाना भी ढककर रखा था। कोई भी उनके पास नहीं था। एक तसले में राख पड़ी थी। उसमें खखार(कफ) पड़ा था।वृद्ध ने उठकर बैठने का प्रयास किया। हमने उन्हें लेटे रहने के लिए कहा और पास ही बैठ गए। मित्र ने परिचय कराया। वृद्ध व्यक्ति ने जब अपनी बात कही हम सुनते ही रह गए। वे कहने लगे मास्टर साहब मैंने दिन रात मेहनत करके बच्चों के लिए जमीन खरीदी।मकान बनाया। उन्हें पढ़ाया लिखाया किन्तु आज जब ऐसी अवस्था हो गयी है मेरे बेटे बहू भी दूर ही रहते हैं।पोते पोतियों तक को मुझसे बात नहीं करने देते हैं। मैं अकेला पड़ा बोर हो जाता हूँ। नौकर खाना पानी रख जाता है। खाऊँ या न खाऊँ कोई पूछता तक नहीं।
उनकी बात सुनकर मैं सोच रहा था कि माता या पिता पुत्र के बीमार होने पर उसे यू नहीं छोड़ देते बल्कि मां या पिता पूरी पूरी रात जागकर उनकी देखभाल करते हैं। वे यह सब नहीं सोचते क्योंकि उनका बेटा उनकी आँखों का तारा है। वे बच्चे की सेवा बड़े प्रेम से करते है। हम बड़े होने के बाद उनके किये गए त्याग को भूलकर उनसे घृणा करने लगते हैं। प्रेम के बदले उन्हें कष्ट मत दीजिए। यह संभव है कि आज व्यस्त होने के कारण आपके पास समय न हो किंतु बच्चों को तो उनके पास जाने से मत रोकिये क्योंकि व्यक्ति सामाजिक प्राणी है और वह एकाकी जीवन नहीं जी सकता मृत्यु तो एक दिन सभी को आनी है किंतु इस डर से कि हम बीमार हो जाएंगे माता पिता की सेवा करना तो बंद नहीं कर सकते। जिस युवा ने अपने माता पिता की सेवा नहीं की वह कभी उनके ऋण से मुक्त नहीं हो सकता है। आपका समय कितना ही कीमती हो माता पिता आपके प्रेम भरे बोल सुनने को बेचैन रहते हैं। आपके घर आने की राह देखते हैं। उनसे दो मीठे बोल जरूर बोलने की आदत हरिद्वार को डालनी चाहिए। उनकी भावनाओं को ठेस मत पहुँचाइए।
धर्मवीर गुप्ता
Very nic sir ji
जवाब देंहटाएं