अगर राष्ट्रीय स्तर पर या किसी भी प्रदेश में भाजपा - वामपंथी मोर्चा के गठबंधन की बात हो तो सहसा किसी को यकीन नहीं होगा , सैद्धांतिक स्तर में दो धुर विरोधी खेमा एक दूसरे के साथ कैसे आ सकते हैं ? , लेकिन कहते है न प्यार और जंग में सब जायज है और सत्ता के गलियारे में कुछ भी असंभव नहीं होता है । ऐसा ही पश्चिम बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में हुआ है ।
गौरतलब है कि बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में भाजपा ने वामपंथी मोर्चा से गठबंधन कर सबको चौंका दिया , दोनों दलों ने चुनाव से पूर्व समवाय बचाओ समिति नाम से संगठन बनाकर चुनाव लड़ा जबकि तृणमूल कांग्रेस की ओर से भी 46 सीटों पर नॉमिनेशन दाखिल किया गया था, लेकिन चुनाव से पहले ही 35 सीटों पर चुनाव से ठीक पहले ही तृणमूल उम्मीदवारों ने नामांकन वापस ले लिया था , बंगाल में पहली बार भाजपा और वाम मोर्चा ने साथ चुनाव लड़कर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को बुरी तरह पराजित कर दिया । दोंनो दलों के साथ आने के बाद समनवाय समिति चुनाव के नतीजों का आलम यह रहा कि नंदकुमार के बहरामपुर को-ऑपरेटिव ऐग्रिकल्चरल सोसायटी के चुनाव में तृणमूल खाता ही नहीं खोल पाई , जबकि यहाँ कुल सीटों की संख्या 63 हैं , कुल 63 सीटों पर भाजपा - वामपंथी मोर्चा ने कब्जा जमा लिया । भाजपा - वामपंथी गठबंधन की यह जीत इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष यानी 2023 में पंचायत चुनाव होने हैं और पंचायत चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारियों में जुटी हुई हैं , इसके अलावा 2024 में आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी सबकी नजर है , खासकर ममता बनर्जी जी खुद को विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं, ऐसी स्थिति में भाजपा भी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है , हालांकि 2018 में हुए पिछले पंचायत चुनाव की बात करें तो ग्राम पंचायत की कुल 48636 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 38118 बीजेपी को 5779 वाममोर्चा को 1713 कांग्रेस को 1066 एवं अन्य को 1960 सीटें प्राप्त हुई थी । पंचायत समिति के 9214 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 8062 बीजेपी 769 वाममोर्चा 129 कांग्रेस को 133 एवं अन्य को 121 सीटें प्राप्त हुई थी एवं जिला परिषद के कुल 824 सीटों में तृणमूल कांग्रेस को 793 बीजेपी 22 वाममोर्चा 1 कांग्रेस को 6 एवं अन्य को 2 सीट प्राप्त हुई थी, यानी लगभग लगभग 90 फीसदी सीटों पर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी , तृणमूल कांग्रेस ने 34 फीसदी सीटें निर्विरोध जीतने में सफल रही थी, हालांकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर यह भी आरोप लगते रहते हैं कि पार्टी के दबंगों के कारण कई उम्मीदवार अपना नामांकन नहीं भरते या वापस ले लेते हैं , यही कारण है कि निर्विरोध चुनाव में जीतने वाले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की संख्या इतनी ज्यादा है । ऐसे में अगर वाममोर्चा भाजपा साथ आ जाते हैं तो संगठनात्मक स्तर पर भी भाजपा को अधिक बल मिलेगा और उम्मीदवार नामंकण और चुनाव लड़ने से नहीं डरेंगे।
विगत लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो पश्चिम बंगाल के कुल 42 लोकसभा सीट के लिए मतदान हुए जिसमें 22 सीटों पर संघीय मोर्चा को सफलता मिली जिसमें तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा भी शामिल थी जबकि बीजेपी 18 सीटों पर विजयी रही थी , अगर मतों का प्रतिशत देखे तो संघीय मोर्चा को 43.3% जबकि एनडीए को 40.7 % मत प्राप्त हुआ था , जबकि कांगेस और वाम मोर्चा को क्रमशः 5.67 % एवं 6.33% मत प्राप्त हुआ था , कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दोनों ही मोर्चा के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था लेकिन तृणमूल कांग्रेस को तकरीबन 12 सीटें गवानी पड़ी थी , ऐसे में अगर भाजपा और वाममोर्चा साथ आते है तो ग्राम पंचायत चुनाव पर तो प्रभाव पड़ेगा ही लोकसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल की तस्वीर बदल सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है, क्योंकि वाममोर्चा को जो 6.33% का मत लोकसभा में प्राप्त हुआ था , वो वाममोर्चा के कैडर वोटर हैं , जो किसी भी स्थिति में भविष्य में भी वाममोर्चा के साथ बने रहेंगे , ऐसे में यह आंकड़ा न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने में सफल होगा अपितु चारों खाने चित भी कर दे सकता है । क्योंकि जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते कांग्रेस से भी तल्ख होते जा रहें है , इस बात की तरफ स्पष्ट संकेत करते हैं कि तृणमूल कांग्रेस आगामी किसी भी चुनाव में शायद ही कांग्रेस को साथ लेकर चुनाव लड़े , क्योंकि ममता बनर्जी अक्सर गैर कांग्रेसी विपक्षी एकता की न सिर्फ बात करती है अपितु कहीं न कहीं उनके मन में यह इच्छा है कि सभी विपक्षी दल उन्हें विपक्ष के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार ले, इतना ही नहीं ममता बनर्जी वामपंथी मोर्चा को भी पुनः अपने पाँव फैलाने का मौका बिल्कुल ही नहीं देना चाहूगी , इसीलिए समवाय समिति के चुनाव के पहले ही तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि प्रदेश में भाजपा और वाम मोर्चा की मिली भगत एक्सपोज हो गयी है । हालांकि पश्चिम बंगाल खासकर ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा - वाम मोर्चा गठबंधन को लेकर अटकले तेज हो गयी हैं ऐसे में सवाल उठता है कि समवाय समिति का चुनाव साथ लड़ना दोनों दलों की महज अवसरवादिता थी या फिर यह बीजेपी का यह एक प्रयोग है । अगर यह दोनों दलों के लिए प्रयोग है तो इस प्रयोग के प्राथमिक नतीजे दोनों ही दलों के लिए न सिर्फ उत्साहवर्धक हैं अपितु पश्चिम बंगाल में एक बड़े बदलाव की तरफ भी संकेत कर रहे हैं। अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को अपने साथ लाने में सफल हो जाती है तो आने वाला समय तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।
लेखक अमित कुमार अम्बष्ट " आमिली " प्रसिद्ध कवि, आलेखाकार व रचनाधर्मी हैं।
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