एक बहुत बड़ा सरोवर था। उसके तट पर एक मोर रहता था, और वहीं पास एक मोरनी भी रहती थी । एक दिन मोर ने मोरनी से प्रस्ताव रखा कि, "हम तुम विवाह कर लें, तो अच्छा रहता...क्योंकि इस वीरान जंगल में हम एक दुसरे का सहारा बन जाते" !
मोरनी ने पूछा :- "तुम्हारे मित्र कितने है ?"
मोर ने कहा :- मेरा तो कोई मित्र नहीं है ।
इतना सुनते ही मोरनी ने विवाह से इनकार कर दिया । मोर बेचारा मायूस होकर अपने तट पर लौट आया और सोचने लगा... सुखपूर्वक रहने के लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है क्या ??
काफी सोचने के बाद मोर ने निर्णय लिया कि, वो भी कुछ मित्र बनाऐगा ! बस कुछ ही दिनों में मोर ने एक सिंह से.., एक कछुए से.., और सिंह के लिए शिकार का पता लगाने वाली जासूस टिटहरी से.., दोस्ती कर लीं । और फिर एक बार अपने विवाह का प्रस्ताव लेकर मोरनी के पास पहुंच गया ! और जब उसने यह समाचार मोरनी को सुनाया कि, अब मैंने भी बहुत सारे जीवों से, पक्षियों से दोस्ती कर ली है ! तो वह तुरंत विवाह के लिए तैयार हो गई । दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ और एक अन्य पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने लगे !
समय बीतता गया मोरनी ने अंडे दिए, अंडो से बच्चें हुऐं ! दोनों बहुत खुश थे अपना भरा-पुरा परिवार पाकर..! जिस पेड़ पर मोर-मोरनी ने घोंसला बनाया था उस पेड़ पर और भी बहुत सारे नये-नये पक्षी रहने के लिऐं आ गये थे ! पहले से काफी चहल-पहल हो गयी थी !
एक दिन एक शिकारी शिकार के फिराक में उसी जंगल में आया । दिन भर कहीं शिकार न मिला तो वो उसी पेड़ की छाया में ठहर गया जिस पेड़ पर मोर-मोरनी और उसके बच्चें रहतें थे ! शिकारी अभी कुछ परेशान सा और सोचने में लगा ही था कि, उस पेड़ से मोरनी के बच्चों की किलकारी सुनाई दी..! शिकारी की आंखें धूर्तता से चमकने लगी ! शिकारी भूख से भी बेहाल था ! उसने सोचा कि, पेड़ पर चढ़कर इन्हीं बच्चों की मांस से भूख मिटाई जाये ।
मोर दंपत्ति ने जब शिकारी को देखा तो भारी चिंता हुई, वो डर के मारे सहम गये ! मोर-मोरनी आपस में विचार-विमर्श करने लगे ...तभी मोरनी ने कहा :- अपने मित्रों से सहायता मांग कर देखों शायद वो हमारी कोई मदद कर सकें ! मोर को ये बात जंच गयी और फौरन अपने मित्रों के पास सहायता के लिए दौड़ पड़ा । रास्ते में ही सिंह की जासूस टिटहरी मिल गयी !
टिटहरी ने पुछा :- क्या बात हैं मोर भाई...इतने बदहवास में कहां भागे जा रहें हो ??
मोर ने अपनी सारी व्यथा टिठहरी को सुना दी और कहा कि, मेरी सहायता न हुई तो शिकारी मेरे बच्चों को पकड़ कर ले जाऐगा !
टिटहरी ने मोर से कहा :- थोड़ा धैर्य रखो मित्र ! अभी तुम्हारे समस्या का सामाधान हो जाऐगा !
बस फिर क्या था..,
टिटहरी ने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया । जिसकी आवाज सिंह तक पहुंच चुकी थी ! सिंह तुरन्त समझ गया कि, जरूर कोई शिकार फंसा है तभी टिटहरी इतनी तेज-तेज चिल्ला रही है । सिंह झटपट उस आवाज की दिशा में चल पड़ा और उसी पेड़ के नीचे जा पहुंचा जहां शिकारी अपने मनसूबे को अंजाम देना चाहता था..!
इतने में कछुआ भी टिटहरी की आवाज सुनकर पानी से निकलकर बाहर आ गया और सारा मामला समझते देर ना लगी !
इधर सिंह की नजर जैसे ही शिकारी पर पड़ी वो दहाड़ता हुआ शिकारी की तरफ दौड़ा ! अब तो शिकारी के भी जान के लाले पड़ गये ! शिकारी ने सोचा यहां से भागना ही उचित होगा ! भागते हुऐं उसकी नजर कछुऐं पर पड़ी ! शिकारी ने कछुए को अपने साथ ले चलने की बात सोची कि, आज इसी से अपनी भुख मिटाऊंगा । जैसे ही कछुऐं को पकड़ने के लिऐं शिकारी ने हाथ बढ़ाया ही था कि, कछुआ पानी में खिसक गया । बस इसी लालच में शिकारी का पैर फिसल कर दलदल में फँस गया, भागने की कोई गुंजाइश ही ना बची !
इतने में सिंह आ पहुँचा और शिकारी को अपना शिकार बना लिया !
मोर ने टिटहरी, कछुऐं और सिंह को धन्यवाद देते हुऐं कहा :- मित्रों आज तुमलोग ना होते तो पता नहीं क्या हो जाता ! फिर थोड़ी देर औपचारिक बातें करते हुऐं सभी ने विदा ली !
मोर जब मोरनी के पास पहुंचा तब मोरनी ने कहा :-- "मैंने विवाह से पूर्व मित्रों की संख्या पुछी थी, याद हैं आपको ?? बस इन्हीं और ऐसे ही विपत्तियों के समय के लिऐं ही मित्रों का होना बेहद अनिवार्य हैं !
अब मोर को वाकई में आभास और ज्ञान हो चला था कि, मित्र की महत्ता और कीमत क्या होती है ?? "यदि मित्र न होते, तो आज हम सबकी खैर न थी ।”
मित्रता सभी रिश्तों में अनोखा, आदर्श और अनमोल रिश्ता होता है, और हां परखने के लिऐं नहीं निभाने के लिऐं मित्रता करें।
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