स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता से एक बार फिर लखीमपुर डायलिसिस मरीजों की ठिठकती छिटकती जिंदगियां खतरे में आ गयी हैं। एक तरफ बारिश दूसरे तरफ बाधित विद्युत आपूर्ति और ऊपर से बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था न हो पाना, इन कारणों से शुक्रवार की शाम से डायलिसिस सेवा पूरी तरह से बन्द है। संवेदनहीन सम्बंधित अधिकारी हांथ पर हांथ धर कर रिमझिम बरसात का आनंद उठाते प्रतीत हो रहे हैं और डायलिसिस के गम्भीर मरीज इंतजार कर रहे हैं अपनी इस जीवनदायिनी सेवा डायलिसिस के चालू होने का।
उल्लेखनीय है कि पर्याप्त तैयारी के बिना विगत 11 अप्रैल को शुरू हुई डायलिसिस के लगभग छः महीने बीतने जा रहे हैं, लेकिन इतनी गम्भीर प्रक्रिया अभावों व अव्यवस्थाओं के बीच मरीजों की जिंदगियों से खेलती हुई गैर जिम्मेदारी की पटरी पर चल रही है। हालांकि सेंटर में मौजूद स्टाफ अव्यवस्थाओं व पर्याप्त संसाधन की कमी में भी पूरी जी जान लगा रहा है लेकिन फिर भी कमी तो कमी है जो बार बार डायलिसिस मरीजों के लिए जानलेवा साबित होती है।
बिना किसी नेफ्रोलॉजिस्ट के शुरू हुए डायलिसिस सेंटर पर आज तक कोई गुर्दा रोग विशेषज्ञ नही आ पाया है। देखते देखते अब तक डायलिसिस कराने वाले कई मरीज प्राण गवां चुके हैं। जाने कितनी और जाने लेने के बाद इस सेंटर को नेफ्रोलॉजिस्ट नसीब होगा। यह सेंटर लखीमपुर जैसे शहर में बिना बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था के शुरू हुआ था। जबकि बिजली के बिना डायलिसिस सेंटर का कोई अर्थ ही नही बचता है। ऑरो से लेकर डायलिसिस मशीन तक सब विद्युत ऊर्जा पर निर्भर होता है। ऐसी दशा में विद्युत आपूर्ति बाधित नही होनी चाहिए। जबकि यहां आज तक जेनरेटर या डीजी की व्यवस्था नही हो पायी है।
अभी गत सप्ताह विद्युत आपूर्ति ठप होने से तीन दिन डायलिसिस बन्द रही थी। उस समय मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ा था। इस शुक्रवार की रात से फिर विद्युत आपूर्ति बाधित है। शनिवार को डायलिसिस नही चली और बरसात देखते हुए आज भी उम्मीद नही लग रही। उधर जिन लोगो की सप्ताह में तीन डायलिसिस हो रही हों, ऐसे पुराने व गम्भीर मरीजों के विषय मे सोंचकर भी रूह कांप जाती है। इनकी जिंदगी पल पल मौत की तरफ बढ़ती है ऐसे में इनका इंतजार कितना लंबा होगा यह एक नेफ्रोलॉजिस्ट ही समझ सकता है। ये मरीज खुद नही समझ पा रहे कि यह इंतजार डायलिसिस का कर रहे हैं या जिम्मेदार लोगों की कृपा से मौत का।
इसके अलावा इस सेंटर पर डायलिसिस की 5 मशीनें निगेटिव की हैं, जिसमे एक अक्सर बन्द रहती है। निगेटिव मतलब हेपेटाइटिस वायरस निल रोगियों के लिए। दूसरी तरफ एक मशीन हेपेटाइटिस सी वायरस के लिए एक मशीन सुरक्षित है। इनमें निगेटिव मरीजों को वायरस से सुरक्षित रखने के प्रयासों की बानगी तो पूरी कर ली लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। एरिया अलग कर देने से वायरस चिपक तो नही जाता। दरअसल यह वायरस देखने, छूने या सांस लेने से नही फैलता, बल्कि यह हेपेटाइटिस सी का वायरस ब्लड के सम्पर्क में आने से फैलता है। नेफ्रो गाइडलाइंस के तहत डायलिसिस कर रहा स्टाफ खासकर टेक्नीशियन अलग होना चाहिए क्योंकि वह रक्त का शुद्धिकरण डायलिसिस मशीन से कर रहा होता है इसलिए बहुत संभव है कि उससे यह वायरस निगेटिव मरीजों को पास्टिव कर सकते हैं। उसे निगेटिव एरिया में जाने के लिए स्वच्छता के सारे मानक पूरे करने के बाद ही निगेटिव क्षेत्र में जाना चाहिए। मगर यहां मैथेड ही कुछ और है। इसके पीछे शायद यहां स्टाफ का अभाव हो सकता है। खैर यहां वायरस नही एरिया बांटने में विश्वास है।
बेहतरीन डायलिसिस के लिए प्राथमिक जांचे जैसे बुखार, बीपी और सुगर बेहद जरूरी है, जो कि डीसीडीसी डायलिसिस डायरी के छपे पन्नो में साफ दिखता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि व्यवहारिक रूप से यहां सिर्फ कागजी खानापूर्ति होती है। इसका भी कारण है कि पर्याप्त स्टाफ नही। यहां सिर्फ एक नर्सिंग स्टाफ है जिसके पास इतना अधिक लेखा जोखा होता है कि गाइडलाइंस के मुताबिक हर मरीज की मैनुवल जांचे सम्भव नही, उस दशा में जब मरीजों के बेड पर डिजिटल बीपी मॉनिटर न लगा हो। लेकिन आंकड़ों में हर मरीज के डायलिसिस में कम से कम चार, पांच बार बीपी रीडिंग मिल जाएंगी। कुछ जागरूक मरीज अपना बीपी मॉनिटर साथ लाते हैं लेकिन सबका सम्भव नही। इसी तरह शायद ही कभी कभार सुगर टेस्टिंग होती हो। जबकि डायलिसिस गाइडलाइंस में आप पाएंगे कि कम से कम शुरुआत और आखिरी सुगर, बीपी, फीवर व इसके अलावा बीच मे 3 या 4 बार बीपी चेकिंग जरूरी होती है डायलिसिस को बेहतर बनाने के लिए। इस तरह की और भी कई छोटी बड़ी अव्यवस्थाएं हैं।
इधर इंसानी जिंदगियों से ज्यादा कीमती बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था की बुनियाद यानी चबूतरा, जिसपर डीजी रखा जाना है। वह अब तक तैयार नही हो पाया है। डीजी तो बहुत आगे की बात है। 5 माह चबूतरा विवाद में स्थानीय स्वास्थ्य विभाग व डायलिसिस सेंटर के बीच सिर्फ यह तय नही हो पाया कि सेंटर यहां रहेगा कि वहां, और बदलने की स्थिति में चबूतरे के खर्चे का नुकसान होगा। चाहे इंसानी जिंदगी चली जाय लेकिन चबूतरे के खर्चे का नुकसान नही होना चाहिए। अंततः जिला स्वास्थ्य विभाग ने बीते सप्ताह परमिशन दे दी, अब बारी है डायलिसिस संस्था की कि वह कितना इंतजार करवाती है।
आलम यह है कि आज सुबह से लगातार बारिश हो रही है, ऐसे में तो उनके पास और बढ़िया बहाना होगा जो परसो व कल विद्युत आपूर्ति सुचारू नही कर पाए थे। लेकिन अतिगम्भीर श्रेणी में आने वाले डायलिसिस मरीजों की जिंदगियां दांव पर लग चुकी हैं। जिम्मेदार संवेदनहीन लोगों के लिए अच्छी बात यह होगी कि इंसानी जिंदगियां उनके घरों से अंनत यात्रा के लिए कूच करेंगी। उनके ऊपर किसी प्रकार का आरोप नही होगा। चबूतरे का खर्चा बचेगा अलग। सुविधा सम्पन्न लोग तो आसपास के या सुदूर क्षेत्रो में जाकर डायलिसिस सेंटरों पर डायलिसिस ले कर खूद को स्थिर रख लेंगे, लेकिन अभावग्रस्त निगेटिव व हेपेटाइटिस सी पास्टिव डायलिसिस मरीजों के लिए बहुत विकट समस्या है, जिनके लिए आसपास , या सुदूर डायलिसिस ले पाना और खुद को स्थिर रख पाना टेढ़ी खीर है। इनका तो सिर्फ ईश्वर ही सहारा है, यह ईश्वर के सहारे कितना लंबा इंतजार खींच सकते हैं यह ईश्वर जाने।
😭😭
जवाब देंहटाएंप्रशासन कृपया ध्यान दे😡
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